मुस्तक़बिल के हाल बयान करूँ
या हालाते हाजरा पर करूँ बात
में वही तेरा एक मुशत ग़ुबार हूँ
जो मेरे जज़बात से मिल गया
धूवाँ हूँ वोह जो फ़िज़ाओं में फ़ैल गया
३ के साथ चला था जुबेर
सात की कही बात, छः की कही बात
पांच पर फ़ैसला हुआ हक़ के साथ
ढ़ाई माह की अज़ियत ने कुंदन बना दिया
कनी को जोहरी ने ऐसा तराशा कोहिनूर जुबेर को बना दिया
तुम जुदा हुए ऐसे की तनहा रह गए हम
छूट गया तज़वी मुसल्ला
तेरे हर सितम अकेले ही सेह गए हम
मेरे बुतख़ाने से जुदा हुई मूर्ते राम
हर फ़िरंगी में तेरी सूरत को
देखते रह गए हम.
दिल में बस गई थी तेरी मूर्त,
अब कोई दूजा राम
बुतख़ाने में नसब हो नहीं सकता
तेरा बंद दरवाज़ा हमारे
दिल को एक धोख़ा है
हमारी आँखों पर एक पर्दा है.
हम तेरे शहर में आये थे मुसाफ़िर की तरह
कुचा ऐ यार में भटका फिरा जुबेर
ना हुआ दीदारे यार रहा अजनबी की तरह
ताकते रहे महल में तेरी बाबे आमद
कुछ भी दिखाई ना दिया तेरी सूरत की तरह
इश्क़ में उनकी चाहत से
बाज़ू ऐ क़ुव्वत तो हासिल हो गई
करामाती दस्त उनका छूने से
चेहरा अनवार से मुनव्वर हो गया
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں