अज़ीज़ नाज़रीन
ख़ाकसार की नज़म इश्क़े
हक़ीक़ी और इश्क़े मज़ाजी पर मब्नी है. माशूक़ से मुराद ख़ाकसार
के पीरो मुर्शिद से है. दुनिया से मुराद ख़ाकसार का इश्क़े मज़ाजी
(ख़ातून-प्रेमिका) जो के एक ज़िम्नी ख़ाका है जिसको ख़ाकसार ने अपने तस्सव्वुरे ख़याली
में क़ायम कर रखा है. इश्क़ की इन्तहा ला महदूत इश्क़े हक़ीक़ी. बारी इलाहा
जिसकी कोई इन्तहा नहीं. इस नज़म में तब्सिरा है उस इश्क़ मजाज़ी इब्तेदा से
इश्क़ हक़ीक़ी इंतहा तक आने वाली परेशानी और ख़तरात का जिक्र किया गया है.
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(ज़िम्नी अक्स दुनिया)
में कमज़ोर पड़ हूँ, तेरी और खींचा जा
रहा हूँ,
तेरी मोहब्बत में है वोह कशिश,
टूट कर बिखर रहा हूँ में,
जितना तेरे नज़दीक आता हूँ,
उतना तुझसे दूर जाता हूँ,
या रब हौसला दे मुझे इतना
तेरी मोहब्बत पर हावी ना हो पाए
फितना,
कमज़ोर ना पड़ जाए तेरी मोहब्बत,
हावी ना हो जाए उसकी चाहत,
मोहब्बत का है दस्तूर पुराना,
है इम्तेहान लेता ज़माना.
मेरी मोहब्बत में भी इम्तेहान की
घडी आई
तू जैसे जैसे तज़दीक आई,
जीतना है मुझको ज़माना
तुझको भी तो है, मुँह दिखाना
ना जाने क्या कशिश है तुझमे,
मेरा वजूद भूले जाता हूँ,
रुक पाना अब है मुश्किल
तेरी और खींचा जाता हूँ.
ना संभाल पाऊंगा खुदको,
तेरे प्यार की कशिश में
खुदको बोहोत कमोज़र पाता हूँ,
तेरी मोहब्बत की इब्तेदा थी,
चंद गुफ़्तार अलफ़ाज़
चंद इज़हारे ख़याल,
वोह लाभों की जुम्बिश (हालते नमाज़)
पर दिल था नापाक.
(मुर्शिद से)
हो गया अब में दस्तबरदार,
आ गया अब तेरे दरबार
अब तेरी मोहब्बत में इन्तहा पर आता
हूँ.
तेरी मोहब्बत में
इब्तेदा से इन्तहा
तक है जाना
इब्तेदा से इन्तहा तक सफर
तुमको साथ है निभाना.
लरज़ते हैं क़दम दौराने
सफर
तुमने हाथ
ना है छोड़ना.
हर हाल है साथ निभाना.
तुम करते हो मोहब्बत की बात
रुसवा न हो जाऊं नफ़्स है साथ
बात करो मेरे सनम की
बस उसकी मोहब्बत है पाक.