सहाफ़ी जुबेर
बरोज़ हफ्ता (सनीचर) बमुक़ाम नई बम्बई दोपहर ३.०० बजे.
--- *** ---
तुमने अपना रुतबा दिखाया नहीं, हमारा रुतबा देखा नहीं
तो अब हमसे कोई पैग़ाम रसाई नहीं।
अलफ़ाज़ ही तो हैं जो तेरे जिगर में पेवस्त हो गए,
क्या मुझे तेरी तकलीफ़ और अज़ीयत का एहसास नहीं,
तेरा हर अमल और ख़ामोशी तेरी परेशानी साबित कर गए
तू ज़ुबान से कहे या ना कहे तेरा अमल तेरी परेशानी बयान कर गए.
तेरा एक छोटा सा मज़ाक (मखौल)
ज़िन्दगी की तल्ख़ हक़ीक़त बन गया
तेरा साथ तो छूट गया, पर ख़ुदा का साथ मिल गया।
३ दिनों की मोहलत दी थी किसी ज़ालिम ने
ख़त्म करने अहले हक़ २००२ में,
ख़त्म किया हमने तमाम समाजी वसीला तेरी मोहब्बत में.
हाँ में ज़िंदा हूँ, मगर फ़ौत हो चुके हैं जज़बात, एहसासात
और जिस्म की क़ुव्वत, दर्जे हरारत
इंसानियत के ज़ुल्म पर हो गया ख़ामोश
पस साँसे रही ज़िंदा, देख कर तेरी बर्बरियत।
ख़ातून जोशी, मिश्रा सहाफत में हुई हमारे नक़्शे क़दम
बनी ज़ुबान हमारी लगी बोलने हमारी बोली
ले लिया जोग इस दुनिया के झमेलों से हमने
अज़वाजियत, सहाफत और इबादत से कर लिया परहेज़ हमने।
दुनियां को नज़दीक करने की हिस्र में हम खुद से दूर हो गए
माशूक़ की मोहब्बत में हम तुझसे ख़ुश पर खुद से दुखी हो गए।
हिज्र की कैफ़ियत में अश्क़ों से जिगर के दाग़ धो गए.
ख़ुदा बुलन्दियों को छूते तुझे क़दम अता करे
क़लम जो तेरे हाथ में आये तो अदल अता करे
तुझको फ़ूलों सी ठंडी बाग़ की छाँव अता करे.
जो ख़ुशी मिले आपको एक बार
तो वह हर बार, बार बार अता करे.
सहाफी जुबेर