अज़ीज़ नाज़रीन
बाबरपुर से ६० किलोमीटर दूर धन्नी पुर में मोदी मस्जिद के लिए ज़मीन भीख में दिए जाने पर ज़मीर फ़रोश ग़ुलाम नस्ल बोहोत खुश दिख रही है। इस मुद्दे पर एक तवील मज़मून लिख रहा हूँ। फ़िलहाल नज़म पेश ऐ ख़िदमत है।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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इसी को कहतें हैं रब की लाठी जो होती है बेआवाज़
जब पढ़ती है, पानी नहीं
मांग पाता दज्जाल फ़िर्क़ाबाज़
राम के नाम पर मेहनत
की किसी ने, फल भोगा फ़क़ीर ने
ख़ूब की सियासत ताला
खुलवाने से ले कर पूजा की इजाज़त
शहादत से ले कर रथ यात्रा
तक
सभी को मिल गया मेरे
रब का जवाब अब होगा फ़क़ीर का हिसाब
मुनाफ़िक़ों की होंगी नस्लें बर्बाद सुर्ख़ फ़ूलों से की जिसने ताज़ीम
होगी उसकी भी मौत बिल-आख़िर
दुनियां ऐ फ़ानी में कर ली तूने अपनी मन मानी
आख़िर सफ़र में तेरा कौन होगा हामी
तेरी मुनाफ़ेक़त, ग़द्दारी की कहेगी मिल्लत दास्तान
मीर जाफर की तरह मिल्लत भेजेगी तुझ पर लानत करेगी लान तान
तुम्हारी औक़ात दिखा दी काफ़िरों ने ऐ मुसलमान
सुव्वर बाड़े की तरह शहर की म्युनिसिपल हुदूत से ६० किलोमीटर
कर दिया तुमको बाहर
मुसर्रत दिखाना तुम्हारी मजबूरी है सुर्ख़ गुलाब उड़ाना तुम्हारी लाइल्मी
तुमको क्या मिला जो तुम इज़हारे ख़ुशी कर रहे
क़ानून साज़ों से पूछो तुम्हारी हैसियत शहर में नहीं
बल्दिया क़ानून के हिसाब से सुव्वर बाड़ा बने शहर की हद से दूर
तुम्हारी मस्जिद थी जिस पर डाका डाला
शहर से ६० किलोमीटर दूर अब बनेगा सुव्वर बाड़ा
तुम उस पर भी ख़ुश हो जब काफ़िरों ने किया तुमको किनारा
बेशर्मों शर्म करो तुम्हारी मय्यत पर ना होगा कोई रोने वाला।
सहाफ़ी ज़ुबेर