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31/12/2023

बाबरपुर से ६० किलोमीटर दूर अब सुव्वरबाड़ा।

अज़ीज़ नाज़रीन

बाबरपुर से ६० किलोमीटर दूर धन्नी पुर में मोदी मस्जिद के लिए ज़मीन भीख में दिए जाने पर ज़मीर फ़रोश ग़ुलाम नस्ल बोहोत खुश दिख रही है।  इस मुद्दे पर एक तवील मज़मून लिख रहा हूँ।  फ़िलहाल नज़म पेश ऐ ख़िदमत है। 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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 इसी को कहतें हैं रब की लाठी जो होती है बेआवाज़

जब पढ़ती है, पानी नहीं मांग पाता दज्जाल फ़िर्क़ाबाज़

 

राम के नाम पर मेहनत की किसी ने, फल भोगा फ़क़ीर ने

ख़ूब की सियासत ताला खुलवाने से ले कर पूजा की इजाज़त

शहादत से ले कर रथ यात्रा तक

सभी को मिल गया मेरे रब का जवाब अब होगा फ़क़ीर का हिसाब


मुनाफ़िक़ों की होंगी नस्लें बर्बाद सुर्ख़ फ़ूलों से की जिसने ताज़ीम 

होगी उसकी भी मौत बिल-आख़िर 

दुनियां ऐ फ़ानी में कर ली तूने अपनी मन मानी 

आख़िर सफ़र में तेरा कौन होगा हामी


तेरी मुनाफ़ेक़त, ग़द्दारी की कहेगी मिल्लत दास्तान

मीर जाफर की तरह मिल्लत भेजेगी तुझ पर लानत करेगी लान तान 


तुम्हारी औक़ात दिखा दी काफ़िरों ने ऐ मुसलमान 

सुव्वर बाड़े की तरह शहर की म्युनिसिपल हुदूत से ६० किलोमीटर 

कर दिया तुमको बाहर  


मुसर्रत दिखाना तुम्हारी मजबूरी है सुर्ख़ गुलाब उड़ाना तुम्हारी लाइल्मी 

तुमको क्या मिला जो तुम इज़हारे ख़ुशी कर रहे  

क़ानून साज़ों से पूछो तुम्हारी हैसियत शहर में नहीं 

बल्दिया क़ानून के हिसाब से सुव्वर बाड़ा बने शहर की हद से दूर 


तुम्हारी मस्जिद थी जिस पर डाका डाला  

शहर से ६० किलोमीटर दूर अब बनेगा सुव्वर बाड़ा 

तुम उस पर भी ख़ुश हो जब काफ़िरों ने किया तुमको किनारा 


बेशर्मों शर्म करो तुम्हारी मय्यत पर ना होगा कोई रोने वाला।  

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

30/12/2023

यक़ीन की बुनयाद पर था तामीर रिश्ता तेरा मेरा

तसव्वुर ए ख़यालात में सजा रखी थी तस्वीर ए यार

तेरे एक अलफ़ाज़ ने तुझे मुझ से दूर कर दिया

तेरे गुफ़्तार का आतिश-फ़िशाँ ऐसा फूटा हम पर

जुबां से निकले उन अलफ़ाज़ ने हमको ज़र्द-रू कर दिया


काज़िब था या हक़, तेरा बयान यह तो रब ही जाने 

मुद्दे की हक़ीक़त ने हमको फ़िर जीने का हौसला दे दिया


एहसास की शाख़ पर तामीर था घरोंदा मेरा

तेरे अलफ़ाज़ की ज़द ने उसे चकनाचूर कर दिया 


कोई बुतख़ाने में जा कर बुतों को पूजें, 

एहसास में सजा कर तसव्वुर ए यार 

जब हों बेयार ओ मददगार हम तुझको पूजें 


ख़ुशनुमा हवा का झोंका था तेरा आना जाना 

अब ना तेरे आने पर मुसर्रत ना जाने पर ग़म का एहसास रहा 

 

यक़ीन की बुनयाद पर था तामीर रिश्ता तेरा मेरा

जब एतेबार ही टूट गया तो कहाँ रहा रिश्ता मोहब्बत भरा 


हिन्द की मस्जिदों में डाका डाल बैठा दिए हज़ार ख़ुदा

अरबिस्तान पाकिस्तान इंग्लिस्तान में क्या कर रहा है बुतख़ाना तेरा 


सहाफ़ी ज़ुबेर

22/12/2023

सरहद फिर गर्म हो गई है।

 जहाँ अक़ल ख़तम होती है वहां से तेरी हिकमत शुरू होती है

जब सभी दरवाज़े बंद होतें हैं तेरी रेहमत हज़ारों दरवाज़े खोल देती है।  

 

ज़ाफ़रानी तानाशाही की हर बार की वही है दास्तान

जब जब इन्तेख़ाब आये हरारत बढ़ी सरहद पर और मारे गए जवान 

 

शिद्दत पसंदों के बीच शुरू हुई फिर वही बेहूदा राग फिर वही हुई बात

जंग करेगें पाकिस्तान से जंग करेगें आज़ाद कश्मीर ले कर रहेगें


अक्टूबर से हुआ आग़ाज़ इस मौत के खेल का मार्च तक खेल चलेगा 

कभी पाकिस्तान को कोसा जाएगा कभी कश्मीरी अवाम 

कभी जंग के झूठे नक़्क़ारे बजेगें कभी हमको ही दहशतगर्द कहेंगें


३७० हटाया था इसीलिए कश्मीर बन जाए लाज़मी हिंदुस्तान

आज ५ साल में भी वही क़िस्सा फिर कौन है मोरिद-ए-इल्ज़ाम 


लंगूर लँगूरनियों की मजबूरी देखो, हुकूमत की चापलूसी करते  

सहाफ़त, नौकरी के नाम पर भड़वागिरी करते 

हुकूमत से ना करते जाइज़ सवाल 

नाजाइज़, लायानी ख़बरों पर करते बवाल  


फ़ौजिओं का ढेर होना है सियासी दिखाती कश्मीर पर हुकूमती नाकामी 

पठानकोट उरी या पुलवामा हर इन्तेख़ाब से क़ब्ल शुरू जंग का वही रोना  


सिर्फ कश्मीर पर नहीं हर मुद्दे पर नाकाम हुए ज़ाफ़रानी 

हमदर्दी फिर लेंगें किस मुद्दे पर क़तल करेगें अपने ही फौजी 

जीतना चाहेगें ख़ौफ़ दिखा कर पाकिस्तान या मुसलमानी 


सहाफ़ी ज़ुबेर

रह रह कर तेरा ख़याल आता है

आज उनके हुजरे में एक फ़रिश्ता देखा 

सिफ़त में उसको पतिंगे जैसा देखा 

ख़ुदा की रेहमत का उसको अलम्बरदार देखा 


ए रब हमारे, हमसे वोह इम्तेहान ना लेना जिसको देने की क़ुव्वत ना हो 

गर तेरा इम्तेहान है बोहोत सख़्त तो उसकी मश्क़ की हिदायत देना    

गर उम्मी है मिल्लत तो अज़ीयत सहने की क़ुव्वत भी देना  


अजीब सी आवाज़े सुनाई देती हैं मुझको 

कभी कोयल की कूक कभी बादलों की गरज सुनाई देती है मुझको   

चौंक के जो होता हूँ बैदार कुछ दिखाई ना देता है मुझको 


तेरे इश्क़ का जूनून है या ख़ौफ़ ए ख़ुदाई

लरज़ जाता हूँ बाहों में भरके तुझको 


बड़ी ही देर तक रहा वोह मेरे हमराह 

हाथों में पकड़ कर फ़िज़ाओं में परवाज़ को छोड़ दिया उसको

फ़िर ना जाने कहाँ हो गया ग़ायब दे कर इनाम मुझको


रह रह कर तेरा ख़याल आता है बार बार


इंसाफ़ के इंक़लाब को कहते हो दहशत या वतन से ग़द्दारी

नाइंसाफ़ी वतन में होंगी तो आवाज़ वतन को ही सुन्ना होगी हमारी 


हक़ के मुद्दे पर एक हुए आज मुसलमान 

हुजूम से निकाल क़तल करो जो पाकीज़ा जंग को करते हैं बदनाम 

ना कोई मुनाफ़िक़ रहा ना कोई ग़द्दार अब दरमियान


सज़ा का मुस्तहिक़ है हर वोह मुल्क 

जंग में जो यहूद, नसरानी और कुफ़्र की करे ताईद

चाहे वोह बेहर हो रेन या मुत्तहिदा अरब का साहिल।


 हमारी मस्जिदें जब हड़प की गई इनजस्टिसतान में 

तुम्हे कोई हक़ नहीं बुतख़ाने करो तामीर हमारे वतन में 


सहाफ़ी ज़ुबेर 

21/12/2023

जिहाद फी सबिलिल्लाह।

अल्लाह की राह में जिहाद का वक़्त आया,

ईमान कामिल करो मुस्लमानों जंग का वक़्त आया


बावज़ू शुरू किया इस जंग को बावज़ू किया ख़तम 

पानी नहीं मुयस्सर चेहरे पर ख़ाक़ लगाते हम 

कभी इस्तेमाल किया शीशे को कभी पत्थर को 

दुश्मन पर दो धारी शमशीर साबित हुए हम


मेरा रब जिससे चाहे ले ले काम ना चाहते हुए भी शरीक हुआ 

इन्साफ़ की जंग में हर अवाम ख़ास ओ आम 


तेरे नाम से आग़ाज़ किया हर नेक अमल 

एक एक मुजाहिद लाखों से नहीं कम


मस्जिदों पर आई आफ़त हो रही खाक़ ए हिन्द सुर्ख़ 

नाइंसाफ़ अदालतों पर फ़ाइज़ हुई नस्ल ए इब्लीस   

करो इन्साफ़ तुम्हारे पाक अमल से आतिश ए नार हो जाए ख़बीस   


अदालतों से अदल की तवक़्क़ो है फ़िज़ूल

अदलिया काम कर रही दहशत के अधीन 


काले कोट की दहशत ने बरियानी का झूठ फ़ैलाया 

मुसलमानों के लिए नफ़रत को मज़ीद  बढ़ाया 


इन्साफ़ की आस लिए दर दर भटके हर इंसान 

काले कोट की दहशत ने फ़रोख़्त किया क़ानूनी निज़ाम 

हो मुवक्किल जब सरकारी या हो सियासी

फ़र्ज़ी गवाहों और दस्तावेज़ों के बल पर   

बेगुनाह को भी चाही ना मिले माफ़ी


मेरा रब बड़ा ही कारसाज़ बड़ा ही रेहमान 

तुम करते रहे साजिशें मेरे रब ने ग़ाफ़िल किया ज़ालिम का ध्यान


कमज़ोर नामर्द ज़ाफ़रानी ख़ून ख़राबे की करते बात 

लुगाई देख होते फ़रार फिर भी ना छोड़े नादानी

मर्दों जैसी एक सिफ़त नहीं केप्सूल पूनावाला ज़ाफ़रानी


आलमगीर ओरग़ज़ेब रहेमा के नाम से ऐसा चिढ़ता 

उनकी दौर ए हाकिमियत में जैसे हुई इसकी मुसलमानी (सुन्नत)


झूट फ़रेब ख़ूब फ़ैलाता कहता फ़िरता ख़ुद को मुसलमान 

दोगली फ़ितरत है इसकी मुस्लिम हक़ पर ज़ाहिर होता इसके अंदर का शैतान 

मंदिर मस्जिद ख़ूब करता लुगाई देख होता फ़रार 

हमारे बीच हो जाता मुसलमान वैसे फ़ितरती ज़ाफ़रान 


ऐसे मुनाफ़िक़ों से बच कर रहना कब लूट लें तुम्हारा ईमान

दोज़ख में रहेगें ऐसे केप्सूल सबसे अदना पायदान 

 

सहाफ़ी ज़ुबेर 

19/12/2023

अपनी मोहब्बत पर ना हो बदगुमान

या ख़ुदा तेरी किस किस नेमत का शुक्रिया करूँ अदा  

इनामों की जो देखी फ़ेहरिस्त मेरा हर शुक्र लगता है बोहोत कम 

 यह सब तुम्हारा ही तो करम है मुर्शिद, 

माशूक़ की दुवाओं में है बोहोत दम

 

मेरे जिस्म पर हाज़िर थे दोनों शैतान और रेहमान 

जब जंग हुई दोनों के दरमियान फ़तहयाब हुए हम


तेरी अज़ीयतों का नेमुल-बदल  दिया रब ने मिल्लत को 

जितना ज़ब्त करोगे उसमे मिल्लत का फ़ायदा बड़ा है 

अहल ए आलम में होगा सब्ज़ परचम बुलंद  


अपनी मोहब्बत पर ना हो बदगुमान 

तूने सिर्फ जलाल देखा है कहाँ देखा जमाल 


जब फ़तह है मुजाहिदों का मुक़द्दर उनको कौन रोक सका है

जहाँ पर ना हो इबलीस की रसाई वहां तो नूर ही नूर बिखरा पड़ा है।

जहाँ है शैतानी मर्कज़ वहां पर भी रब ही बड़ा है 


कर अपनी ज़हानत यहूद, नसारा और कुफ़्र से बुलंद 

गर तेरी परवाज़ में वोह क़ुव्वत नहीं माशूक़ से कर मदद तलब   

फ़िज़ाओं को क़ैद कर ले ज़ालिम की 

कभी मोईनुद्दीन ने की थी जगतपाल जोगी की 


सहाफ़ी ज़ुबेर

17/12/2023

बग़ावत

 बोहोत हो गई तनक़ीद तौहीद के ग़ुलामों की

याद रही तुमको भी लम्बी बोहोत हुई ज़ुबान शायरों की 


गर मिल्लत की हो चुकी हो तुम्हारी तनक़ीद पूरी 

तो दिखा दो ज़ालिम हुकूमत को लाल आँख तुम्हारी 

बाग़ी हूँ में बग़ावत मेरा काम

जो भी चाहो दे दो मुजाहिद या दहशतगर्दी का नाम

हक़ीक़त हो चुकी है तमाम आलम पर अयाँ


दहशतगर्द नहीं हम हर ज़ुल्म, नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ लड़ने वाले हैं मुसलमान 

हाकिम हो कर जो लूटे आवाम के आशियाने 

दर्ज होगा उनका ज़ालिमों में नाम 

हो गए नंगे कुफ्र, यहूद और मर्कज़ नसरानी

अबू ओबेदा वोह मुजाहिद हैं, ज़ालिम को मारा जिसने पिला कर खारा पानी 


कभी फ़लस्तीन का अवाम कभी बर्मा और हिन्द का मुसलमान 

होता था अश्कों और अलम का शिकार  

मुजाहिदों के हौसलों से वो ग़म जो तबस्सुम से होता है बयान 


तेरे सजदों में ग़फ़लत से तू ना हो परेशान

डाकू वहीँ डालता है डाका जहाँ होता है माल 

दौरान ए नमाज़ तेरे वस्वसे काफ़ी हैं करने शैतान को परेशान


 ए मुसलमां तू अल्लाह की याद में हीरा बन जा 

होंठों से लगाने पर ज़ालिम के लिए ज़हर बन जा 

बिछा दे हर राह तबाही के बारूद तू रास्तें में ज़ालिम के 

जहाँ हो आगाज़ ज़ालिम के ज़ुल्म का वहीँ पर फट जा 


मुहाफ़िज़ जब ख़ुद ही बन जाए क़ातिल

नाइंसाफ़ी हो जाए जब आम अदल की मसनद पर ताहम

अदलिया का ना करो नाम बदनाम 

लुगाई को देख कर ना होते हो फ़रार तो मुक़ाबला करो १५ मिनिट में साफ़   


सहाफ़ी ज़ुबेर,

13/12/2023

ज़ालिम और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ उठो

 दर रोज़ साँझ सवेरे मोरे आँगन चैन की बंसी बजती है 

शुक्र अदा करूँ पल पल मोरे अनदेखे प्रियतम का

मेरे हर क़दम पर उसकी हस्ती दिखती है।


ज़ुल्म, शिद्दत या हो नाइंसाफ़ी हर बात तुझ पर ही कियों जचती है 

इंसाफ़ का तराज़ू टूट गया, अदालत भी तेरी दहशत से डरती है।  


हर आईनी इदारे को ग़ुलाम बनाया, हर ख़ित्ते में हक़ हमारा ही मारा है 

तुमने इस दफ़ा को मन्सूख़ कर कौन सा तीर मारा है 

पाक के बाद चीन अब ओ.आई.सी. को भी साथ हमारा है 


मुनाफ़िक़ हो तुम अपने ही क़ौल से फिर गए 

मसला हल हो दो मुल्कों की बाहमी रज़ामंदी से 

तीसरा पक्ष नहीं तुमको ही गवारा है


इनजस्टिस-तान का एक तरफ़ा फ़ैसला नहीं मंज़ूर हमको 

पाक को ले कर बात करोगे तभी फ़ैसला है क़ुबूल हमको।  


तेरी एक तरफ़ा हिकमत तेरी तानाशाही को दिखाती है 

जब होगी जंग इस मुद्दे पर देखें किस ख़ित्ते में तुझे पनाह मिलती है।   


नाइत्तेफ़ाक़ी की ख़लीज हुई बेहद क़वी

ज़ालिमों, काफ़िरों दहशतगर्दों ने हर दम, की है एतेमाद की ख़िलाफ़वर्ज़ी  

नाइन्साफ़, ज़ालिम की अदालत, एवान पर अब हमें यक़ीन एतेमाद नहीं  


सहाफ़ी ज़ुबेर

09/12/2023

अकबर अकबर मुबारक

 मुबारकबाद का सिलसिला फिर चल पड़ा है

अकबर भाई के लिए फिर काम बड़ा है

जो करते थे लतीफ़े सदर पर सियासत उनके घर की है लौंडी 

ऐसों के मुँह पर तमाचा और जूता पड़ा है। 

ग़द्दार है वोह ऊँची टोपी वाले जो करते हैं मजलिस के किरदार का क़तल 

मजलिस बचाओ के नाम तभी तहरीक रकून और अमजद गटर में पड़ा है। 


हमें पसंद है कांग्रेस का फ़ैसला अगर उसमे मिल्लत का भला है 

खुरच के साफ़ करो गंदगी निकाल बहार करो ज़हर को घर से 

पहले अपना जिस्म पाक करो फिर नफ़्स, बिल आख़िर घर पाक करो 


तेरे फ़ैसले पर तिलमिला गया ज़ाफ़रानी 

अंगार ऐसी लगी सुलग कर ख़ाकी निकर हो गया धानी

तेरी हलफ़ बरदारी की किस को पड़ी है 

तू तो दहशतगर्द नसरानियों की एक कड़ी है   

ग़द्दारी करना सिफ़त है तेरी,  

इंडिया से बग़ावत करना पार्टी की आदत पुरानी    


हमें तो मोहब्बत है तुमसे काम करो मिल्लत के लिए 

और मांगो रब से 

तू है मक़बूल सभी में तभी तो तेरा नाम अकबर पड़ा है 


ज़ालिम की साजिशें हुई नाकाम, मश्क़ वहदत ना रोक सका  

३ हदफ़ कबीर हुए नूर में फ़तह ३ सग़ीर हुए तारीकी में फ़तह 

  

सहाफ़ी ज़ुबेर

08/12/2023

वक़्फ़ हो गई मुस्कराहट तेरे लिए

एक तारा टिमटिमाता हुआ, एक सख़्ती से खड़ा है

दो मुजाहिदों ने जंग लड़ी, दो का नाम बड़ा है

वक़्फ़ हो गई मुस्कराहट तेरे लिए,

हमें तो माशूक़ और उसकी ज़ुल्फ़ों से इश्क़ हो गया है


अब यह लबों के पैमाने खुलेगें तो तेरे लिए 

मेरी ज़ुल्फ़ों की छावों है सिर्फ़ तेरे लिए 

में कभी धूप में कभी छावों में रहूंगी तेरे लिए।


जीत लेगा जो दिल मेरा में उस ही की रहूँगी 

जो करेगा वफ़ा मुझसे में उस ही को दिखूंगी


जीत लिया है दिल मेरा तूने अब में तेरे पास ही रहूंगी,

 नहीं कोई चिलमन की क़ैद अब तो में तुझे हर रोज़ दिखूंगी।


 तेरे इश्क़ में कहाँ कहाँ भटक आये हम

तुझको पाने की चाहत में कभी काबा कभी मदीना चले आये हम


तुझे देखने की आरज़ू हुई इसलिए तुझे बुला लिया मेने 

तेरे दीदार पर ज़माने को भूला दिया मेने 


आँखों से झलक आये जो अश्क उनके भी फ़िराक़ ए यार में 

रब की रेहमत से मायूस ना हैं इतनी अज़ीयत पा कर भी 


उनके बहते अश्कों पर रब अपना जलवा दिखाएगा 

अनहोनी सी जो बात है अहल ए आलम के लिए उनको पूरा कर पायेगा 


सहाफ़ी ज़ुबेर

06/12/2023

बारगाहे ख़ुदावन्दी में तू मासूम हो गया

 एक सवाल जो हमने माशूक़ के जानशीन से पूछा

वही सवाल किसी ने हमसे पूछा, दिखावा है या हक़ीक़त

तेरा ज़ाहिरी अमल दिखावा है बातिन में रूहानी फैज़ जमा है


बारगाहे ख़ुदावन्दी में तू मासूम हो गया जो रो रो कर माँगा 

ख़ुदा ने तुझे अता किया जो रो रो कर माँगा

अपने ग़ुरूर को ख़ाक में मिला दिया, उसके दर पर हाथ जो फ़ैलाया  

कभी झगड़ा अपनों से फ़िर सुलह कर लिया, 

जो भी कमाया मिल जुल कर खाया 

यह दुनियां फ़ानी है तेरी दौलत आनी जानी है, यहीं रह जानी है।


चले थे चिलग़ोज़े देने शाकिस्त, मुजाहिद नही हुए कम

किसी जमात का शायर या हो लल्लू राम (चूनावाला)     

लुगाई को देख जो हो जाते फ़रार, ऐसे कमज़ोर जमात 

करते हैं तनक़ीद सदर के पास नहीं दम


तुम जैसे चूज़ों को सदर साहब ने भड़का के खड़ा कर दिया, यह क्या है कम। 

सियासत उस ही के घर की लौंडी है जिसके पास है दम। 

जो बरसाती मेंढक हिजाब नक़ाब पर करते रहे सवाल फ़िरोज़  

उनके पास इलज़ाम लगाने के सिवाए अब कुछ काम नहीं अलफ़ाज़ हैं कम।  


अबू लूलू फ़िरोज़ हो या हो फ़िरोज़ खान, 

एक ने शहीद किया उमर बिन ख़त्ताब ते दूजे ने पामाल की बुर्क़े की आन


उम्मा की बक़ा के लिए मेने खुद के जज़बात कर दिए क़ुर्बान   

यही सोच हर ग़ैर ज़रूरी अमल तर्क किया  

क्या होगा गर ख़ुदा ने कफ़्फ़ारा मिल्लत से ले लिया


सहाफ़ी ज़ुबेर

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...