तन्हाई में
माशूक़ से सरग़ोशी का लुत्फ़ ही अलग है
कभी उसकी बातें सून कर बेइख़्तयार हस देता हूँ
कभी अपने गुनाहों को याद कर रो देता हूँ
दीवानों सी कैफ़ियत रहती है तन्हाई में तेरी महफ़िल में
सनम
कभी हस देता हूँ कभी रो देता हूँ
रूख़ को बिगाड़ लिया ग़ैर की निगाहों से ख़ुद को छुपाने
को तुमने
तुम्हारी बातिनी कैफ़ियत छुप ना सकी, ईमानी दर्जे से ज़ाहिर हो गई
नूर ज़ाहिर हो गया चेहरा रोशन हो गया
हम हर इंसान से मोहब्बत हैं करते,
हर ख़ातून पे हैं करते नाज़
नाइन्साफ़ हमारे दुश्मन ज़ालिम पर करते वार
तुम्हे करने बर्बाद तीन हदफ़ ज़ालिम के हुए थे तय्यार
बर्मा हुआ बर्बाद, यहूद ग़र्क़ाब, कुफ्र को कर लो फ़तह
दो अलफ़ाज़ की जलन अस्लहा की मार से तेज़ धार
लंगूर, लँगूरनियाँ, ज़ालिम हुए सुन कर घायल और परेशान
१५ मिनिट आतिश बाज़ी होगी, घड़ी है मेरे पास
है तनक़ीद की पूरी गुंजाइश यक़ीन हमें तंज़ीम पर
मोहब्बत है हमारे रहबर से इश्क़ है हमारा अकबर
पेशकर्ता जुबेर अहमद खान सहाफ़ी