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23/04/2024

मोहब्बत में किसी और की शिराकत न हो

 मोहब्बत में किसी और की शिराकत न हो

मेरे दिल में क्यों किसी दुश्मन का तस्सवुर हो   

नफ़रत में ही सही क्यों ना लबों पर बस तेरा नाम हो 

 

ग़ैरों के दामन में सिर्फ़ ज़िल्लत और रूसवाई  

तकलीफ़ में ही सही तेरे लबों पर क्यों ना मेरा ही नाम हो

में एक भटकती हुई अर्वाह हूँ,

बर्फ़ की तरह पिघल जाऊंगा जो शमा मेरे नज़दीक हो

 

तेरे वजूद से था रौशन ज़िन्दगी का हर ज़र्रा

जो तू नहीं तो क्यों ना हमको भी तख़्लिया नसीब हो

 

ख़यालों की दहलीज़ तक आ कर चला जाता है अक्स तेरा

तू ना सही तेरा एहसास तो मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो

तू शामिल है मेरी ज़िन्दगी के हर लम्हे में

जिस्मानी मौजूद होना ज़रूरी नहीं

क़ैद है तेरा एहसास दिल के सनमख़ाने में ।

 

क्यों छुपा कर रखूँ दुनियाँ से में अपनी मोहब्बत को

होशवाले लिफ़ाफ़ा देख कर मज़मून भांप लेते हैं

इश्क़ वाले ख़ुश्बू सूंघ कर बाग़ का पता जान लेते हैं 


रूसवा हो गई आज मेरी मोहब्बत तेरा नाम ले कर

तेरे नाम से जुड़ गया मेरा नाम दुनियाँ दिखाने को यह बात काफ़ी है। 


सहाफ़ी ज़ुबेर

08/04/2024

अपने वोट की ताक़त पहचानो।

 ए २०% मुसलमानों अपने वोट की ताक़त पहचानो

आज नामनिहाद झुका है कल ग़द्दार ज़ालिम नाइंसाफ झुकेगा

 

जो फ़ैलाते थे झूट वोट बैंक राजनीती, तुष्टिगुण

उनके हौसले टूट जायेगें देख तुम्हारे गुण

 

बोहोत कीमत हैं तुम्हारे वोट में ए मिल्लत

जिसको चाहो खाक़ में मिला दो जिसको चाहो अर्श पर बिठा दो

जिसको चाहो उखाड़ फेंको जिसको चाहो गद्दी पर बिठा दो

 

तुम्हारे इत्तेहाद में है बड़ी ताक़त वोट करो एक मुश्त

आज आया है तुम्हारे दर पर कल बात होगी तुम्हारे हक़ की 

यह है मजलिस की कारगरदेगी ज़हरीले नागों ने बात की है हिस्सेदारी की

 

तुम्हारे आने पर तब उनको करना होगा ख़ैर-मक़्दम

जब तालीम, सियासत, रोज़गार और मुलाज़मत में होगी तुम्हारी हिस्सेदारी

 

बेरुन मुल्क “ इंडिया आउटके नारे पर जीत गए मुख़ालिफ़

अपने मुल्क की हिस्सेदारी, क़ियादत के नारे पर जीतोगे तुम

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

06/04/2024

" NEW INDIA "

 जिन्ना की बात मानने के लिए एक और गाँधी चाहिए

४७ की बात हुई पुरानी " NEW INDIA " में हमको अपना हिस्सा चाहिए

 

नहीं यक़ीन तुम्हारे किसी भी इदारे पर हमको हमारा इदारा चाहिए

बात करें तुमसे इन्साफ़ की क़ियों हमको पाकिस्तान जाना चाहिए

हाकिम बनाओ हमारे रहबर को नहीं तो हमको एक और बटवारा चाहिए

 

नए भारत की जब बात करता फ़िर कियों उसमे शैतानी होनी चाहिए

नए भारत में हर चीज़ हुई नई हमको भी नई हिस्सेदारी चाहिए

 

अवाम से बात करने से कियों तू डरता सहाफ़ी इजलास कियों नहीं करता

हक़ बोलने वालों से बात कर तेरी बोली बोलने वालों से कियों बात करता

 

जवाब दे ऐसे चुभते हुए सवालों का जो जिगर तेरा फाड़ डालें

पिछले १० सालों में तूने क्या किया, ऐसे सवालों से कियों भागा फ़िरता

पानी का गिलास रख कर दोस्ती क़ायम रहे ऐसी बकवास कियों करता

जिगर फटेगें अभी और तुम्हारे,  भट्टी में जलेगें अभी और तुम्हारे

 

बोहोत हुई भगवा ज़ुल्म की आंधी साधू पर तेरा हंटर कियों नहीं चलता

मुँह से जो हगता ऊल जलूल ऐसों के मुँह पर ताला कियों नहीं लगता

 

मार डालेगें मार डालेगें हर संघी क़ानून हाथ में लिए फ़िरता

मेरा रहबर क्या कोई सफ़ेद मुर्गी का चूज़ा है

उस मुर्गी के साथ जेल में हर क़ैदी ख़ूब मौज करता

 

दहशतगर्दों की ऐसी गीदड़भभकीयों से सिर्फ़ एक काफ़िर ही डरता

ईमान वाले को क्या डरायेगें यह शैतान जो सिर्फ़ अल्लाह से डरता

 

ना झुका है ना झुकेगा एक ईमान वाला किसी ज़ालिम के आगे

जो सिर्फ़ अल्लाह के सामने झुकता

 

जिन्ना की बात सभी ज़ाफ़रानी करते पर

उनकी बात मानने वाला गाँधी कियों नहीं मिलता।


यहाँ नहीं चलेगा तुम्हारा क़ानून यह है हमारा इलाक़ा 

तुम कहते रहो कुछ भी हम कहेगें " सल्तनत ए नख़लिस्तान "

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

लो रुख़सत हुआ रमज़ान

लो पाक महीना रुख़सत हुआ

उसको जाते देख शैतान खुश हुआ

ज़ंजीरों में जकड़ा फ़िर क़ैद से बहार आएगा

मोमीनों को फ़िर से बहकायेगा

 

तरावीह हुई आज ख़त्म तिलावत ए पाक न करना बंद

मेहफ़ूज़ रहा जिनके दिलों में पाक कलाम 

उनको ही कहते हैं हाफ़िज़ ए क़ुरान

 

अपना ईमान करलो पुख़्ता, बाद एक माह की मश्क़ के करते रहो सजदा

मोमीनों से दूर भाग जाएगा शैतान जब उनमे पायेगा ईमान पुख़्ता 

 

रोज़ेदारों पर है ख़ुदा का ख़ास इनाम

सब कुछ जाइज़ ख़ूब खाओ शव्वाल के दिन रौज़ा हराम

 

ईद का दिन ख़ुदा की जानिब से ख़ुशी का है

ग़म का कोई तस्सव्वुर ही नहीं

ख़ुदा की हर नेमत का करो शुक्र अदा

तेरी अज़ामाइश है फ़लस्तीन, कश्मीर और हिन्द का मुसलमान

ख़ुदा की हर आज़माइश के बाद मिलता है बेहतरीन इनाम

 

  ख़ुश होने पर जब मोमीन बादशाह जागीर, हीरे जवाहरात देते हैं इनाम

फ़िर वोह तो बादशाहों का है बादशाह

ख़ुदा की आज़माइश में जो हुआ कामयाब मुसलमान

उसके ख़ज़ानों से क्या क्या मिलेगा नहीं हमें गुमान

 

यह तो पंसारी फ़ितरत है कहता ख़ुद को महान

५ किलों हूकूमती ख़ैरात पर महदूत कर दिया अवाम

 

गुनाहों से पाक हुई वोह ख़ातून जो हुई मुसलमान

महज़ ४ रोज़ तक रही इस्लाम में फ़िर पहुंची पाक साफ़ ख़ुदा के पास

जिस जगह हुई थी दाख़िल ए इस्लाम

उस ही जगह तामीर होगी मस्जिद जो फ़ौत हुई इस माह रमज़ान

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

01/04/2024

अलविदा माह ए रमज़ान और पूर्वान्चाल के शेर "मुख़्तार साहब"

अज़ीज़ नाज़रीन कोई फ़िर्क़ापरस्त, दरिंदा, ज़ालिम, दहशतगर्द, नस्ल कुशी का मुजरिम, हिटलर, रावण, जल्लाद ग़द्दार, क्रप्ट आज़ाद भारत के पहले दहशतर्द को उनो सरदार साहब बोल सकता में अपने मुस्लिम भाई, मज़लूम, इंसाफ़ पसंद, रोबिन्हूड गऱीबों के मसीहा जो फ़िर्क़ापरस्तों, ज़ालिमों, दरिंदों, क़ातिलों, नाइंसाफ़ों, जल्लादों के लिए मौत का पैग़ाम को पूर्वान्चाल के शेर "मुख़्तार साहब" नहीं बोल सकता।  बोलो तुम भी बोलो।  पूर्वान्चाल के शेर "मुख़्तार साहब"

सहाफ़ी ज़ुबेर

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कब आया था कब गुज़र गया रमज़ान

निकल गया एक माह का सियाम

तुझको जुदा होते देख अश्क़ बार है हर रोज़ेदार, 

तेरी आमद पर मुस्सरर्त तेरे जाने पर ग़मग़ीन हैं हम ए रमज़ान

अलविदा ओ अलविदा या माह ए रमज़ान और पूर्वान्चाल के शेर "मुख़्तार साहब"


क़ैद हो गया था इस माह शैतान 

मुनाफ़ा ख़ूब कमा सका तभी हर मुसलमान

क़ैद से हुआ आज़ाद शैतान 

मस्जिदें फिर रहेगीं सूनसान

अलविदा ओ अलविदा या माह ए रमज़ान और पूर्वान्चाल के शेर "मुख़्तार साहब"

हर रोज़ेदार का कुशादा था दस्तरख़ान 

इफ़्तार में रहा खाने का हर सामान

अलविदा ओ अलविदा या माह ए रमज़ान


वोह तरावीह का लुत्फ़ वोह सेहर की अज़ान

प्यास की शिद्दत भूक का एहसास  

सब से ग़ाफ़िल हो फ़िर दुनियां में मशग़ूल हो जाएगा मुसलमान

वोह रूहानी महफिलें हर अमल पर हो सवाब

अलविदा ओ अलविदा या माह ए रमज़ान


रमज़ान आता देख बिलबिला उठा शैतान 

तुमको जाता देख ख़ुशी से झूम उठा शैतान 


अपनी रेहमतें, मग़फ़िरत और जहन्नुम से निजात का दे दिया सामान 

हर रोज़ेदार पर सब कुछ लूटा कर फ़िर चला गया रमज़ान


इस माह में जो गुनाहों से बाज़ रहा और किये अमल-ए-सालेह

उस ने हक़ अदा कर दिया अपने रोज़ों का और पा लिए रमज़ान


इस माह हर रोज़ेदार ने दस्तर-ख़्वान कुशादा कर दिया 

सदक़े, ज़कात ख़र्च  में भी अपना हाथ खोल दिया 

तेरी रेहमत भी रही इस माह के सदक़े जोश में  

मुनाफ़ा बड़ा कर एक नेकी का अज्र सत्तर गुना कर दिया


जिनके पास था और ना दिया वोह बख़ील हो गए 

जिनके पास ना था वोह मिस्कीन हो गए


या ख़ुदा फ़िर अता कर हमको माह ए रमज़ान 

जिसके तुफ़ैल हम सब पाक हो गए 


सहाफ़ी ज़ुबेर

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...