मोहब्बत में किसी और की शिराकत न हो
मेरे दिल में क्यों किसी दुश्मन का तस्सवुर हो
नफ़रत में ही सही क्यों ना लबों पर बस तेरा नाम हो
ग़ैरों
के दामन में सिर्फ़ ज़िल्लत और रूसवाई
तकलीफ़
में ही सही तेरे लबों पर क्यों ना मेरा ही नाम हो
में एक
भटकती हुई अर्वाह हूँ,
बर्फ़
की तरह पिघल जाऊंगा जो शमा मेरे नज़दीक हो
तेरे
वजूद से था रौशन ज़िन्दगी का हर ज़र्रा
जो तू
नहीं तो क्यों ना हमको भी तख़्लिया नसीब हो
ख़यालों
की दहलीज़ तक आ कर चला जाता है अक्स तेरा
तू ना
सही तेरा एहसास तो मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो
तू शामिल
है मेरी ज़िन्दगी के हर लम्हे में
जिस्मानी
मौजूद होना ज़रूरी नहीं
क़ैद है
तेरा एहसास दिल के सनमख़ाने में ।
क्यों
छुपा कर रखूँ दुनियाँ से में अपनी मोहब्बत को
होशवाले
लिफ़ाफ़ा देख कर मज़मून भांप लेते हैं
इश्क़
वाले ख़ुश्बू सूंघ कर बाग़ का पता जान लेते हैं
रूसवा
हो गई आज मेरी मोहब्बत तेरा नाम ले कर
तेरे नाम से जुड़ गया मेरा नाम दुनियाँ दिखाने को यह बात काफ़ी है।
सहाफ़ी ज़ुबेर