ओ बनाने वाले मुझे फ़िर से बना दे
क़तरा क़तरा फ़िर से मिला दे
उम्र फ़िर से २० दे दे
टूट चूका था जो उसे फ़िर से जुड़ा दे।
क़ैद लगा दी सय्याद ने आना नहीं कू-ए-यार में,
आरज़ू मेरी अज़ान है क़फ़स कहाँ मेरी हसरत थी
तेरे इलज़ाम में भी तल्ख़ हक़ीक़त थी
पर हमारी मोहब्बत कहाँ वालिद के जैसी थी
या रब मुझ पर भी करम कर दे
मिल्लत के लिए हुआ बर्बाद मुझे आबाद कर दे
या अल्लाह क्यों आये थे वोह मेरी ज़िन्दगी में
क्यों उनकी मोहब्बत डाली थी तूने दिल में
जब मोहब्बत डाली थी तो
क्यों फ़िराक़ आया मेरी क़िस्मत में
जब वस्ल न था मुमकिन तो
क्यों न निकाल दी उनकी मोहब्बत दिल से
या अल्लाह उन पर फ़िदा हुए तेरी मर्ज़ी से हम
न मिला साथ उनका उसका रहेगा ग़म
अब तू भी क्यों कर किसी को किसी पर फ़िदा करे
जो भुगत रहा हूँ में,
दुआ है मोहब्बत करने वालों को
तू क़यामत तक ना जुदा करे
बोहोत तन्हा हो गया हूँ तेरे जाने के बाद
ख़ुश हुआ दुश्मन हमारी जुदाई के बाद
यही तो है फ़ितरत शैतान की
ख़ुश होता है दो दिलों को जुदा करने के बाद
कब
तक में पराये कन्धों का बनूँ सहारा
परवाज़
मेरी इतनी बुलंद कर ख़ुदारा
जहाँ
चाहूँ पहुँचूँ दोबारा
में
चेहरे पड़ता रहा दूसरों की तकलीफ़ का
ख़ुद
का चेहरा न पड़ पाया
बदल
न सका लिखा अपने नसीब का
जो
आईना दिखा ना सका तक़दीर में लिखा मेरे नसीब का
चेहरे
पर अक्स साफ़ नज़र आ गया मेरी तकलीफ़ का
सहाफ़ी ज़ुबेर