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22/10/2021

मेरी पाक मोहब्बत, मेरा पाक फ़रिश्ता

तेरी हर बात में है पोशीदा जज़बात 

तेरे हर दिखावे में है कुछ बात 

फ़रिश्ते तुझे भी इश्क़ है

इस बात को ज़ाहिर किया तूने आज.

मासूम से तेरे जज़बात, ज़ाहिद का है साथ

ज़ाइद असासों के साथ,

हुए हम तेरे तू है हमारे पास 

 

 

फ़रिश्ते का जो मिला था हाथ 

छूटा नहीं उसका साथ, फरिश्ता जब से हुआ है 

आशिक़ हम पर, हुई हमारी मोहब्बत पाक.

 

 

हक़ ताला भी पाक, मेहबूब भी पाक 

मेरा फरिश्ता कैसे होता नापाक 

जब मिले पाक तो हमको भी कर दिया पाक,

वोह ज़मीन भी पाक और यह ज़मीन भी पाक 

जंग है मेरी पाक जिसमे फ़रिश्ते ने दिया साथ  

 

 

वादा है तुम्हारा याद रहूंगा में मेरा एहलो अहयाल

तुम्हारी दुवाओं में सनम,

वादा निभाना जब तक जुबेर में जान है सनम 

तुम भी हो उसी बाग़ की एक शाख़ सनम 

तुम भी हो हमारी फेमिली का हिस्सा सनम 

 

सहाफ़ी जुबेर 

08/10/2021

میری چاہت

مستقبل کے حال بیان کروں  

یا حالات ہاجرہ پر کروں بات 

میں وہی تیرا ایک مشت غبار ہوں 

جو میرے جذبات سے مل گیا 

  دھواں ہوں وہ جو فضاؤں میں پھیل گیا  

٣ کے ساتھ چلا تھا زبیر، 

سات کی کہی بات، چھ کی کہی بات  

پانچ پر فیصلہ ہوا حق کے ساتھ 




ڈھائی ماہ کی اذیت نے کندن بنا دیا 

کنی کو جوہری نے ایسا تراشہ کوہ نور زبیر کو بنا دیا 





تم جدا ہوے ایسے کی تنہا رہ گئے ہم 

چھوٹ گیا تزوی مسللہ 

تیرے ہر ستم اکیلے ہی سہ گئے ہم 

میرے  بت خانے سے جدا ہوی مورت ے رام 

ہر فرنگی میں تیری صورت کو 

دیکھتے رہ گئے ہم


دل میں بس گئی تھے تیری مورت 

اب کوئی دوجا رام 

بتخانے میں نسب ہو نہیں سکتا 


تیرا بند دروازہ ہمارے

دل کو ایک دھوکھا ہے 

ہماری آنکھوں پر ایک پردہ ہے 





ہم تیرے شہر میں اے تھے مسافر کی طرح 

کوچہ ے یار میں بھٹکا فرا زبیر 

نہ ہوا دیدار یار رہا اجنبی کی طرح 

تکتے رہے محل میں تیری باب ے آمد 

کچھ بھی  دیکھائی  نہ دیا تیری صورت کی طرح 




عشق میں انکی چاہت سے 

بازوئے قوت تو حاصل ہو گئی 

کراماتی دست انکا چھونے سے 

چہرہ انوار سےمنور ہو گیا  



صحافی زبیر

मेरी चाहत

 मुस्तक़बिल के हाल बयान करूँ 

या हालाते हाजरा पर करूँ बात 

में वही तेरा एक मुशत ग़ुबार हूँ 

जो मेरे जज़बात से मिल गया 

 

धूवाँ हूँ वोह जो फ़िज़ाओं में फ़ैल गया 

३ के साथ चला था जुबेर 

सात की कही बात, छः की कही बात 

पांच पर फ़ैसला हुआ हक़ के साथ 

 

 

ढ़ाई माह की अज़ियत ने कुंदन बना दिया 

कनी को जोहरी ने ऐसा तराशा कोहिनूर जुबेर को बना दिया 

 

 

तुम जुदा हुए ऐसे की तनहा रह गए हम 

छूट गया तज़वी मुसल्ला 

तेरे हर सितम अकेले ही सेह गए हम 

मेरे बुतख़ाने से जुदा हुई मूर्ते राम 

हर फ़िरंगी में तेरी सूरत को 

देखते रह गए हम.


दिल में बस गई थी तेरी मूर्त,

अब कोई दूजा राम 

बुतख़ाने में नसब हो नहीं सकता   



तेरा बंद दरवाज़ा हमारे 

दिल को एक धोख़ा है 

हमारी आँखों पर एक पर्दा है.    



हम तेरे शहर में आये थे मुसाफ़िर की तरह 

कुचा ऐ यार में भटका फिरा जुबेर 

ना हुआ दीदारे यार रहा अजनबी की तरह 


ताकते रहे महल में तेरी बाबे आमद 

कुछ भी दिखाई ना दिया तेरी सूरत की तरह 

इश्क़ में उनकी चाहत से 

बाज़ू   क़ुव्वत तो हासिल हो गई 

करामाती दस्त उनका छूने से 

चेहरा अनवार से  मुनव्वर हो गया 

 

 

सहाफी जुबेर 

01/10/2021

या रब या तो मुझे आशिक़

या रब या तो मुझे आशिक़ की याद से ग़ाफ़िल कर दे

या तो तेरी याद में मजनू कर दे,

या तो तेरी मोहब्बत में फ़ना कर दे, 

 

 

बक़ा में ना रहे ज़माने का होश मुझे, 

ना किसी का ख़ौफ़,  ना किसी का ग़म.

मुझे हर शे से बैखोफ कर दे 

अपनी ही मस्ती में मस्त रहूँ में 

तेरी मोहब्बत से लबरेज़ कर दे  

Journalist Zuber

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

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