ख़लास नहीं हुई मजनू, दीवाने, मैकश की सियासत
जंग में फतह, कहाँ हुई और सरहद की इज़ाफ़त
जो ख़्वाब देख रहे हैं मरी के वारिस
ना होगी यम की आरज़ू पूरी
ज़म हुए तुम और हम तो शर्तों पर हमारी
बुज़दिलों का काम नहीं इस्लाम पर मर मिटना
शरीफ़ों के दिल में है शैतान का सीना
कुछ को तोड़ कर निभाई तुमने दहशत की रिवायत
ना तोड़ सकोगे पाक मुजाहिदों की क़ुव्वत
मशीयत ऐ इलाही भी शामिल है उसमे
है जिसकी आरज़ू के क़ायम हो रियासत ऐ मदीना
तेरी तानाशाही का माक़ूल जवाब देगा रब
मसनद से उतार फैकेगा अवाम तुझे हाकिम ऐ वक़्त
अगर वोह दहशतगर्द है तो हर अवाम उसके साथ कियों है
वोह मजनू दीवाना मैकश हो कर भी मक़बूल कियों है
तुम शरीफ़ हाकिम हो कर भी ज़लील रुसवा कियों है
बड़ा ही अहमक़ बदगुमान है तू ऐ इंसान
कहता है तू ख़ुद को मुसलमान
क्या पढ़ता नहीं तू क़ुरान का कलाम
जिसे चाहे वोह इज़्ज़त दे जिसे ज़िल्लत
इस कलाम को ना मान तू होता है बदगुमान।
मुख़लिफ़ हो कर भी वोह अवाम का ताज हुआ
तू हुकूमत पर फ़ाइज़ हो कर भी ज़लील रूसवा हुआ
जितना ज़ुल्म करना था तू कर चूका अब तेरा हिसाब होगा
इस जहाँ में और उस जहाँ में भी तेरे हर ज़ुल्म पर सवाल होगा।
एक दीवाने को मजनू मैकश बोल कर दहशतगर्द
तूने लगाई है तमाम अवाम, उम्मत पर तोहमत
हाँ है वोह दीवाना पाक मुजाहिदों के ख़ातिर
आबरू बनी रहे उस ज़मीन की
जिसे तबाह करने दुश्मन नहीं रहता क़ासिर
तस्वीर में भी आप दिखने लगे,
गुलाबी से आप दिखने लगे
चंद अशआर हमने लिखे थे माशूक़ के लिए
यह क्या हुआ हर सिम्त आप दिखने लगे
सहाफ़ी ज़ुबेर
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