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29/05/2023

दहशतगर्द हाकिम, मजनू दीवाना मैकश मज़लूम।

 ख़लास नहीं हुई मजनू, दीवाने, मैकश की सियासत 

जंग में फतह, कहाँ हुई और सरहद की इज़ाफ़त


जो ख़्वाब देख रहे हैं मरी के वारिस 

 ना होगी यम की आरज़ू पूरी

ज़म हुए तुम और हम तो शर्तों पर हमारी


बुज़दिलों का काम नहीं इस्लाम पर मर मिटना 

शरीफ़ों के दिल में है शैतान का सीना 

कुछ को तोड़ कर निभाई तुमने दहशत की रिवायत 

ना तोड़ सकोगे पाक मुजाहिदों की क़ुव्वत  


मशीयत ऐ इलाही भी शामिल है उसमे 

है जिसकी आरज़ू के क़ायम हो रियासत ऐ मदीना 


तेरी तानाशाही का माक़ूल जवाब देगा रब 

मसनद से उतार फैकेगा अवाम तुझे हाकिम ऐ वक़्त

अगर वोह दहशतगर्द है तो हर अवाम उसके साथ कियों है 

वोह मजनू दीवाना मैकश हो कर भी मक़बूल कियों है 

तुम शरीफ़ हाकिम हो कर भी ज़लील रुसवा कियों है


बड़ा ही अहमक़ बदगुमान है तू ऐ इंसान 

कहता है तू ख़ुद को मुसलमान   

क्या पढ़ता नहीं तू क़ुरान का कलाम 

जिसे चाहे वोह इज़्ज़त दे जिसे ज़िल्लत 

इस कलाम को ना मान तू होता है बदगुमान।  


मुख़लिफ़ हो कर भी वोह अवाम का ताज हुआ 

तू हुकूमत पर फ़ाइज़ हो कर भी ज़लील रूसवा हुआ 

जितना ज़ुल्म करना था तू कर चूका अब तेरा हिसाब होगा  

इस जहाँ में और उस जहाँ में भी तेरे हर ज़ुल्म पर सवाल होगा।   


एक दीवाने को मजनू मैकश बोल कर दहशतगर्द 

तूने लगाई है तमाम अवाम, उम्मत पर तोहमत 

हाँ है वोह दीवाना पाक मुजाहिदों के ख़ातिर

आबरू बनी रहे उस ज़मीन की 

जिसे तबाह करने दुश्मन नहीं रहता क़ासिर     


तस्वीर में भी आप दिखने लगे

गुलाबी से आप दिखने लगे 

चंद अशआर हमने लिखे थे माशूक़ के लिए 

यह क्या हुआ हर सिम्त आप दिखने लगे  


सहाफ़ी ज़ुबेर   

28/05/2023

हस्ती हस्ती रब के इश्क़ में मस्ती

तक़सीम की राह है हिन्द की दो बस्ती

होगी एक की पस्ती ते दूजे की बुलंद हस्ती


 इज़ाफ़ा होगी मिल्लत हमारी हक़ीर होगी तुम्हारी

ख़ामोश ज़ुबाने जब बोल उठेगीं कलमा हक़

हुजूम को देख लरज़ जाएगी तेरी सल्तनत

 

हिक़ारत से जो देखते थे कभी साहिब--मसनद हमको

अदब से हाथ बाँध खड़े होंगे जो आते देखेगें तुमको

  

मिल्लत की आबरू रेज़ी जो की थी कभी तुमने   

तुम्हारी सलतनत, हिकमत देख पाश पाश होंगें वजूद उसके 


हमारी बस्ती में ना होगा अब कोई मुर्तद 

ना होगा दाख़िल कोई दुश्मन हक़ 

दुख्तरान मिल्लत जब होंगीं मेहफ़ूज़ 

तब आएगी रब की रेहमत 


शरीफ़ों ने जो बर्बाद की है पाक बस्ती

मजनू, दीवाना मैकश तबाह कर देगा शरीफ़ों की हस्ती

फ़ैसला हो चूका है जिसका अहल-ए-हक़ पर

बर्बाद कर लोगे अपनी हस्ती यूं जिद्द कर


सियासात हुई नहीं ख़लास अभी उसकी 

मिटाना चाहते हो तुम हस्ती जिसकी 

हाथ थामा है रब ने जिसका 

बाल भी बींका कर ना सकोगे तुम उसका 


यह क़ुव्वत आई है कहाँ से उसको 

फ़रिश्तों ने थामा है जब हाथ उसका 

गर हो क़ुव्वत तुम्हारी रब की ताक़त से ज़्यादा 

शाकिस्त दे कर दिखाओ मैदान ऐ जंग में उसको


जो हो गए फ़रार ख़ौफ़ ऐ शैतान पर कर यक़ीन 

पुख़्ता नहीं था उनका ईमान रेहमान पर यक़ीन  

दर बदर भटकना होगा अब मुक्क़द्दर उनका

साथ छोड़ जो हो गए फ़रार हक़ का 


इम्तेहान भी देता है वही जो अपने इल्म की करता है मश्क़ 

क्या ख़ाक फतह हासिल करेगें फ़रार तिफ़्ले मकतब 


सहाफ़ी ज़ुबेर

27/05/2023

जदीद हिन्द में क़दीम बात

 ईमान वालों ना रहो एक दुसरे से जुदा तुम अहल-ए-इस्लाम 

एक हो जाओ आपस में शीर-ओ-शकर

भुला कर हज़ार शिकवे एक हो गए तमाम मुसलमान

 

अहले हिन्द हैं करता हाकिम बात जदीद

जदीद दौर में जो बात करतें हैं ज़ईफ़

साजिशों की तोहमत हम पर लगाते रहते खुद बईद

 

जदीद दौर में हिन्द में बात हुई क़दीम

किरदार है जदीद हिन्द का, जैसा था क़दीम सऊद के यहूद  

फैसला भी होगा रब का अरब के मानिंद क़दीम


जैसी तुम्हारी सोच वैसा तुम्हारा अमल 

जैसा तुम्हारा अमल वैसा फैसला रब


तुम आरज़ू रखते हो बनो आलमी उस्ताद 

मुस्लिम उम्मत के लिए दिलों में तुम्हारे बुग्ज़, आलूद और बू बास 

तिजारत करो हमसे, हमारी ही नस्ल करो साजिश के साथ बर्बाद

क्या ऐसे होगा अल हिन्द आबाद, होंगी कुफ्र की नस्ल बर्बाद  


ऐ ईमान वालों तैयार करो अहल-ए-हक़ वालों की बस्ती

तालीम हो जदीद पर इल्म हो क़दीम

तुम्हारा ख़ानदान हो जिसमे में मुक़ीम 

 तौसीह करो सरहदों की, हिफ़ाज़त करे मुजीब

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

26/05/2023

तेरे अलफ़ाज़ में शहद सी मिठास।

 हमारी मोहब्बत को छुपा कर

तेरी मोहब्बत को आम कर दिया

इश्क़ ऐ मजाज़ी को कर पोशीदा

इश्क़ ऐ हक़ीक़ी को मक़बूल कर दिया।

 

तेरी नेमतों का शुक्र कैसे अदा करूँ मौला

हमें तो शहद की मक्खी से भी इश्क़ हो गया 

रब्बे काबा ने उसे एहले नास पर शिफ़ा और शीर कर दिया।


शहद सा मीठा है तेरा इसरार ऐ मोहब्बत 

सच्ची बात कहता है कलाम ऐ हक़ 

तुझसे इश्क़ करने की कोई तो वजह चाहिए 

किसी ने तो सिर्फ एक को छोड़ हज़ारों में तुझको देखा।         


ज़िन्दगी भर एक के साथ निभाने का जो करतें हैं वादा 

हर मुश्किल में एक से नहीं उनको हज़ारों से मांगते देखा।


हमारी मोहब्बत पर जो लगाते हैं क़ैद 

मजाज़ी में उन्होंने हमको ४ से नहीं हर नास से मोहब्बत करते देखा

हक़ीक़ी में सिर्फ एक तुझ पर ही मर मिटते देखा।   


वोह शायर ही क्या जो करे अवाम के इसरार पर शायरी

वोह आशिक़ ही क्या जो हक़ीक़ी को छोड़ मजाज़ी पर दिल करे फ़िदा 

शायर वोह जो करे अपने रब की ताबेदारी 

माशूक़ वोह जो करे हक़ की वफ़ादारी

फिर अवाम करे उसकी तरफ़दारी 

 

सहाफ़ी ज़ुबेर 

25/05/2023

मिला तेरी मोहब्बत का सबूत

मेरे इश्क़ और नफ़रत का है एक ही उसूल

जो भी किया हद पार कर जूनून

माशूक़ से इश्क़ किया दीवानगी की हद तक

ज़ालिम नाइंसाफ से नफ़रत की तोड़ उसका ग़ुरूर


बड़ी ज़ालिम हैं तेरी मोहब्बत 

दुनियादारी के दर्स पर वफ़ा का सबूत तो देती है 

पर मोहब्बत का इक़रार नहीं करती  


इश्क़े मजाज़ी में बेवफ़ाई और शर्तों का जलवा नज़र आया 

हर शर्त पर मेरा किरदार नज़र आया 

शर्त वही सच्ची जिसमे ख़ुदा का जलवा नज़र आया 

बड़ी बेवफ़ा है वोह मोहब्बत जो शर्तों पर की गई हो 

फिर हर शर्त पर तिजारत का मरहला नज़र आया।  


वफ़ा के मीज़ान पर जब रखा तुझको 

पाया मेरी मोहब्बत का अलमबरदार तुझको 

सबूत दिया तेरी खुली ज़ुल्फ़ों में    

तब्दील हुए गुलाबी अक्स ने मुझको। 


तेरी याद है की दिल से जाती ही नहीं 

तू है की पास आती ही नहीं 

कैसे होगी मुकम्मल दास्तान ऐ मोहब्बत 

जब क़िस्मत भी साथ निभाती नहीं  


जब दूर ही जाना था तो पास आना ही ना था 

जब पास आये थे तो अपने जलवे दिखाना ना था 

हमको अपना दीवाना बना तुम हो गए रूहपोश  

फ़ुर्क़त के लम्हों पर फ़िज़ूल बहाने बनाना ना था। 


अमन की जुस्तजू लिए अपने कुनबे से दूर हो गया ज़ालिम 

ख़ूंरेज़ी, आदमख़ोरी की बातें छोड़ 

मज़हब ऐ अमन की बातें करने लगा ज़ालिम

 

तेरा ठिकाना तलाश लेंगें अमन के फ़ौजी 

तू लाख रहे फ़रार बेरुन मुल्क 

तुझको तलाश लेंगें फ़ौजी ताहम


जब इतनी मोहब्बत है हमसे 

कियों ख़ामोशी छाई है तुमपे 

लबों को सी रखा है किस डर से   


सहाफ़ी ज़ुबेर

23/05/2023

तेरे दीदार की तशनगी

तशनगी है इस दश्त में तेरे बारान ऐ दीदार का मुंतज़िर था

ख़ुदा की क़ैद थी मुझ पर जब दीदार ऐ यार हुआ रोज़े की हालत में था 

वक़्त का सितम देखो प्यासा ही रह गया, क़ब्ल अज़ वक़्त वोह चला गया 

उसके जाने पर दरिया भी सराब जैसा महसूस हुआ


तेरी चाहत का मुझ पर असर है इस क़दर 

ज़िन्दगी के दश्त में तेरी ज़ुल्फ़ों की तलाश रही उम्र भर 

एक बार नहीं बार बार तुझको देखा 

चलते फिरते उस फिल्म पर

वक़्फ़ कर दिया तेरे नाम ज़िन्दगी का हर गौशा 

तेरी आँखों की मैकशी में डूब, हम हो गए गोशा-नशीन


तेरे इश्क़ में ऐसे डूबे दूर हो गई हिर्स-ए-दुनियां 

तुझको पाने की आरज़ू में दूर हुई दुनियां 

फुर्क़त-ज़दा हूँ लम्हे हिज्र के गुज़ारे नहीं गुज़रते


ख़ाक़ था में तेरी  एक नज़र ने अर्श पर बिठा दिया 

जिस नज़र से तुमने देखा आफ़ताब बना दिया

सब लफ़्ज़ों का ही खेल है

मेरे अज़ीज़ ने एक ज़र्रे को अलफ़ाज़ के कूज़े में सजा दिया


आफ़ताब की तपिश से ज़ुल्म की शिद्दत से

हर नास परेशान हैं नाइंसाफ़ी की आंधी से

 

तुम्हारी इल्तेजा है निभाओ दुनियादारी 

पहले अपनी वफ़ा का सबूत दो 

हम रहे अपनी मस्ती में बाशद दुनियादारी 


२०१८ की पसंदीदा महज़ एक किताब 

२०२२ में पढ़ ली मज़ीद पचास 


रोज़-ए-महशर में जाँ-गुज़ा बूद

अव्वलीन तो पुर्सिश को नियत बूद


ऐ नस्ले आदम नियत को अपनी कर पाक 

नियत पर होगा फैसला सज़ा या जज़ा 

अमल की अव्वल सीढ़ी है नियत। 

अमल कितना ही आला है नियत है गलीज़ या अदना 

कियों न मिले तुझे सज़ा 

अमल कितना ही है अदना नियत आला तो मिलेगी जज़ा।


यह तेरा करम नहीं तो और क्या है  

एतेबार वाल्दैन का मुझ पर जो हुआ है 

जवान दुख्तरान-ए-मिल्लत की अमानत   

कर दी हमारे हवाले, देख तेरा करम अश्क-बार हुए चश्मे हमारे।


ऐ मुसलमां तेरी क़ुव्वत तादाद में नहीं 

ईमान की दर्जे हरारत में है 

जंग की फतह नबी आले नबी से मोहब्बत क़दीमी सोच में है। 

 जदीद तरीन असलाह में नहीं


ज़ाया जायेगें तुम्हारे तमाम जदीद और फ़रेबी फ़लसफ़े 

फतह का परचम क़दीमी सोच में क़दीमी हाथ में है।      


सहाफ़ी ज़ुबेर 

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...