आहिस्ता आहिस्ता सब्ज़ आंधी है आई
तमाम अवाम के दिलों पर छाई
आते गए सभी सब्ज़ परचम के नीचे
सियासी जंग में हुए सभी के बड़े बोल ढीले
कारवाँ ए फ़तह बढ़ता गया
पूरा हिंदुस्तान हुआ हरा
सभी अमन वाले इन्साफ़ की चाहत में
आते गए ज़ेर ए सब्ज़ परचम
आवामी जायदाद का दिल जल गया.
तुमने हमको समझा ही है कब अपना
हमारे मसले हल करने पर कहते हमको पाकिस्तानी
जो कहतें हैं दफ़न कर दिया
उनके पुरखों को जला कर राख कर दिया
कुछ को ज़िंदा जला दिया कुछ को मार के चिता दिया.
अब रंगों में भी लगा दी मज़हब की दिवार
ज़मीन, जानवर, फ़ल फूल और मिठाई
पहले ही हो गए थे हिन्दू मुसलमान
ज़ाफ़रानी तुम्हारा तो सब्ज़ हुआ हमारा
फ़िर दस्तूर लिखने वाले ने यह बात क्यों नहीं मानी
फ़िर करोगे बटवारा हिन्द का मज़हबी इन्तेशार में
भगवा वाले सब तुम्हारे हरे वाले हमारे
जो हों सेक्युलर वोह हो जाएँ सफ़ेद वाले
तिरंगे पर होते हो नतमस्तक
तिरंगे से निकाल दो हरा कलर
फ़िर देखें कौन कहता है तुमको सेक्युलर
रंग हरा नहीं सिर्फ़ हमारा यह है हिन्द का दुलारा
हर अवाम सरसब्ज़ रहे यह है इस रंग का और अज़्म हमारा
जो नाच के अपना पेट भरते
मुर्गी के साथ चूज़ा भी भड़के
माता के साथ लगाए ठुमके
एक ही हम्माम में हैं सभी नंगे
जिस्म दिखाना अय्याशी करना इनकी फ़ितरत
भगवा पहन करते उसकी ज़िल्लत
सभी का दौर ए हाकिमीयत देखा, सफ़ेद की नाइंसाफ़ी देखी
भगवा के ज़ुल्म दहशत नाइंसाफ़ी हिन्द को बेंचना देखा
हरे हाकिमों के दौर में था हिन्द सोने की चिड़िया हरा भरा
इंसाफ़ का पैमाना बेरुन मुल्क ताजिरों
के लिए खोलता था बाब नया
कितना अनदेखा करोगे रंग हरा
हर बार से ज़्यादा उभर कर आएगा रंग हरा
जिस तरह पत्थर पर घिस जाने के बाद रंग देती है हिना
सहाफ़ी ज़ुबेर