खोद के अपने वतन को तलाश रहे थे बुतख़ाना
मस्जिद आ गई गले में अब बनाओगे क्या बहाना
नमाज़ बंद करवा रहे थे मस्जिद निकल गई ज़मीन से
वही मेहराब वही ज़ीना देखे है ज़माना
सभी दबंग हो गए भाईजान का बेख़ौफ़ अंदाज़ देख कर
गूँगे भी बोल उठे तुझको बोलते देख कर
पहले तनहा धो देता था ज़ालिमों के बेहूदा सवाल पर
अब इज्तेमाई धुलाई हो रही है नाइन्साफ़ी की बात पर
जो कभी रहते थे ख़ौफ़ ज़दा लेने से नाम मुसलमान
तीखे सवालों से अब सीना शिगाफ़ कर रहे
नइन्साफ़ हाकिम का हर बात पर
हसीना की ज़ुल्फ़ों पर कब तक करता कलाम
कुछ हासिल नहीं होता मोहब्बत में एक तरफ़ा पयाम
ज़ालिम के ज़हर ने कर दिया ज़हरीला अकसरियत अवाम
वतन से मोहब्बत के नाम पर बना दिया हमको ग़ुलाम
वजूद कमज़ोर कर दिया खोद कर वतन की बुनयाद
अमन तलाश रहा है ज़ालिम कर के हिन्द बर्बाद
इसका असर आज नहीं दिखेगा बरसों बाद
तहज़ीब के नाम पर बस बाक़ी रहा ज़हरीला मवाद
दो आब हुए ज़हरीले हर जानिब बैठे हैं ज़हरीले
किस से करूँ मोहब्बत की बात
ज़ालिम के एक तरफ़ा अमल नाइन्साफ़ी ने
किया माहौल ख़राब
ज़ुल्म हमने सहा शहादत भी हुई हमारी
नस्लें भी हुई हमारी ही गिरफ़्तार
सहाफ़ी ज़ुबेर