میری بلاگ کی فہرست

31/03/2023

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा

दोनों आलम में धूम मची, 

फरिश्तों की ले कर उसको फौज चली

रिक़्क़त ऐसी क्यों  छाई है एहले ख़ाना पर, 

खुश होंगे इनामों की देख कर झड़ी

फ़रिश्ते बदहवास से देखते रह गए

यह किस की रूह है एहले दुनिया से तुम ले कर आये

दोनों आलम महक उठा ख़ुश्बू ऐ आमाल से

जन्नत ने बाब ऐ रेहमत खोल दिए उसकी आमद पे


ख़ुदा ने पूछा फरिश्तों से यह किस रूह को लाये

जवाब दिया तेरी हम्दो सना करने वाले सालेह को लाये


अब्र-ए-रहमत हैं तेरे पोशीदा आमाल 

अश्कबार कियों हैं फिर तेरे एहले ख़ाना 


हूरें हैं बेताब करने दीदार उसका 

मेरा यार चला गया समझा कर 

ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा 


सहाफ़ी ज़ुबेर

30/03/2023

तेरे इश्क़ की क़ीमत

तुझसे तोहफ़े मिलने की तवक़्क़ो करता हूँ रब्बे क़दीर

 तुझसे ही मन्नत पूरी होने की हिकमत की उम्मीद

 

कुन पर हुई क़ायम कायनात, अमल पर हुज्जत तमाम

में आतिशे नार से कियों रहूँ ख़ौफ़ ज़दा

उस दुनियां में जन्नत भी जहन्नुम भी प्यारी

लगती है मौला


इस दुनियां में सूरज की तपिश अज़ीज़ लगने लगी

क़मर की मीठी चांदनी

दोनों आलम की तख़्लीक़ की है तूने

कियों ना मोहब्बत करूँ तेरी हर पैदा कर्दा चीज़ से मौला


इश्क़ वाले हैं वोह जो इश्क़ का मतलब समझा गए

माहे मुकर्रम में जो सवंर गए

इश्क़ में माबूद-ए-हक़ीक़ी का सबील पी लिया

फरिश्तों और हमको इश्क़ का दर्स दे गए


तेरी आमद से दोनों आलम महक गए

ले गए फ़रिश्ते तुझे इत्र मुश्क छिड़कते गए

बेख़ौफ़ तू सो गया अपने मेहबूब का दीदार कर ग़ार में

जैसे दूल्हा सो रहा है अपनी दुल्हन की आग़ोश में


सहाफ़ी ज़ुबेर 

26/03/2023

फ़्रांस का एतेबार ऐ परवाना

 फ़्रांसा से आई है चिठ्ठी ले कर ख़ुश ख़बर

तिजारत का मरहला है उसमे इस क़दर

ख़त एतेबार परवाने के साथ वसूल हुआ 

दस्तावेज़ में शफ़्फ़ाफ़ है पैग़ाम तहरीर किया हुआ

 

ज़प्त कितना करूँ मौला कही मेरी जान ना निकल जाए

लुटे हुए क़ाफ़ले चले शेह्ज़ादियाँ क़ैदी बने

उम्मत के सरताज सरों के ताज अभी भी आगे आगे चले

उनके पीछे उनकी रियाया चले


अहले इस्लाम हो आपस में रहो शीरों शक्कर 

ना रखो अहले उम्मत के लिए दिलों में कुदूरत इस क़दर

मिल्लत के लिए एक दुसरे के ना बनों शेरो शिकार


है तेरे भी किरदार का वही हाल

धुल थी चेहरे पर आइना साफ़ करता रहा

गुनाहों पर गुनाह करता रहा

रहा ला-आशना तू रब्बे ज़ुलजलाल


बढ़ता चल तू हुजूम ऐ पाक के साथ रख सालिम ईमान 

दिया है साथ तेरा रब ने चूम कर तेरा हाथ 

गले लगाया तुझको भूलाया मतलब 

अमल दुश्मन का हुआ आसान 


सहाफ़ी ज़ुबेर

23/03/2023

رمضان مبارک

جمرات مارچ ۲۳, ٢٠٢٣


تمام اہل ا اسلام  کو رمضان کی پرخلوص مبارک باد۔ یا اللہ اس مقدس مہینے میں پوری امت کے روزہ داروں پر اپنی رحمتیں نازل فرما اور ان کی تمام حاجتیں پوری فرما۔  پیاس اور بھوک کی شدت کو برداشت کرنے کی طاقت عطا فرما۔ گناہوں کی لذت دور فرما اور شوال کے چاند تک اپنے روزے صحیح سلامت رکھنے کی توفیق عطا فرما۔  آمین


صحفی زبیر


Happy Ramadan

Happy Ramzan to all the Rozedaar of Ahl-E-Islam. O Allah, shower your blessings on the fasting people of the entire Ummah in this holy month and fulfill all their needs.  Give them strength to tolerate the intensity of thirst and hunger. Take away the pleasure of sins and give them ability to carry their fasts safely till the moon of Shawwal.  Ameen

 

Journalist Zuber 

22/03/2023

मन-कुंतु-मौला

 मन-कुंतु-मौला


कलाम है ख़ूब ख़ास मौसिक़ी है नायाब

मुर्शिद याद आये जब जब सुना यह कलाम


एक अजीब सी कैफ़ियात हुई तारी

नम हुई आँखे तेरे इश्क़ में हमारी

अपने वजूद को भूल रक़्स करने को चाहा मन

पैराहन चाक कर दूँ जब इश्क़ के ऊरूज पर पहुंचे हम


झूम के बेसाख़्ता बोल उठे हक़ हक़ हक़

फ़िज़ाओं को बाँहों में क़ैद कर लिया

दर-ओ-दीवार को तेरे इश्क़ में चूम लिया

गया सजदे में जो ख़्याल तेरा

तेरे इश्क़ में ज़मीन का बोसा ले लिया 



है अजीब इश्क़ की यह मंज़िल

जब ना हुआ था आवारा दर बदर थे हम

जब जूनून चढ़ा तो हाजत भी बढ़ गई।



तू अपनी दरवेशी में इतना बुलंद हुआ

हाजत हुई रब से अपना जलवा दिखा

दहकता हुआ अंगारा अचानक नमूदार हुआ


चिंगारियों की है परवाज़ फ़िज़ाओं में

जैसे जुगनू रक़्स कर रहें हैं हवाओं में

रंग चढ़ा है मुझ पर यह कैसा

सारा आलम बदल गया है जैसा


इस बाग़ की हर शाख़ हो गई मेहफ़ूज़

तिजारत हुज्जत फ़लसफ़ी में हर शाख़ हुई मक़बूल


संभालेगा फिर कौन मकतब-ए-फ़िक्र

गद्दी नशीन होगा वही जो है ज़हीन


सहाफ़ी ज़ुबेर

21/03/2023

नियत पर फ़ैसला

 एक और हमला हुआ नाकाम 

तेरी हर हिकमत होगी बदनाम 

वाह वाह जब यह दुनियां है इतनी हसींन

तो वोह दुनियां होगी कितनी  हमनशीन

 

वादा जो किया था हुआ पूरा

तेरी शैतानियत को लगा पहरा

पहुंचे वक़्त पर मज़िल ऐ मक़सूद

हुआ एहले हक़ के आगे तू मजबूर

 

मेरे हौसलों को ना पस्त कर सका तू 

मेरे साथ रहा हक़ हू

जब भी बढ़ाया क़दम आगे की जानिब

और हाइल हुआ तू  

आ गए फ़रिश्ते मेरा साथ देने तेरे रू बरू


अमल की इब्तेदा है नियत

 नियत होगी पाक फ़रिश्ते देंगें साथ 

 जैसी होगी नियत वैसा होगा अमल 

जैसा होगा अमल वैसा होगा फ़ैसला   


हमने वादा निभाया अपना 

पूरा होगा हर हाल में जो देखा सपना 

मशीयत ऐ ख़ुदा वन्दी जान कर 

अब मिलेगा मुनाफ़ा दुगना 

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

20/03/2023

मुसन्निफ़ और मुसव्विर

 दर्द की हर शिद्दत बर्दाश्त कर लेता है मुसलमां

यह ज़रूरी तो नहीं अज़ीयत उसका मुक़द्दर बन जाए।

 

 नाबीनासमाअत से मफ़लूज हाकिम के पास

  चला है तू ले कर फ़र्याद

 यह ज़रूरी नहीं वोह तेरी हर बात समझ जाए ।। 

 

 मुसन्निफ़ हूँ तहरीर करता हूँ अलफ़ाज़

मुसव्विर है तू क़ियाफ़ा-शनासी हर किरदार

  

मुसव्विर ने ना किये तेरे आज़ा बर्बाद

तेरी ख़ामोशी ने तक़दीर में तेरे लिख दी बर्बादी 

 

किसी के हिस्से में ख़्वाब आये,

किसी की क़िस्मत में हक़ीक़त

किसी की क़िस्मत में नींद आई,

किसी के हिस्से में फ़ुर्क़त

 

जाम  आशिक़ी है तेरी सोहबत    

नशा है तेरी सिफ़त    

 

मेरी ज़ुबान है या अलफ़ाज़ की क़लम 

मुँह खोलते ही हो जाते हैं फ़ैसले

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

19/03/2023

मुसव्विर और तस्वीर

जाम -ए-आशिक़ी पी कर जब नाम तेरा लेते हैं

जो भी अलफ़ाज़ निकले ज़ुबान से हक़ होतें हैं


इश्क़ की शराब में फिर होश कहाँ रहता है 

हम तो दीवाने हुए, तुमको भी दीवाना बना देतें हैं।। 

 

करता हूँ याद तो हर बार याद आती है

हर तस्वीर जाने क्यों जानी पहचानी सी नज़र आती है

जो भी देखी है पहली बार तस्वीर,  

हर तस्वीर क़ब्ल देखी सी नज़र आती है  


किस से बयान करते क़िस्सा ऐ शब-ए-फ़ुर्क़त 

सब पर हावी रही तारीकी और नींद की गफलत

बैदारी रही नसीब में हमारे, थी दीदार ऐ यार की तलब


हर रोज़ एक दर्द नया अपना लेते हैं 

हम यूँही ज़िंदगी तेरे इश्क़ में गुज़ार लेते हैं 


देखते नहीं हैं छुप-छुप के मुजस्समा तेरा

मजाज़ी और हक़ीक़ी में रहने दे कुछ तो भ्रम मेरा 


कूचा यार से आती सबा से ख़ुशूबू लेते हैं

अब नहीं रही कोई हाजत अधूरी अल्हम्दोलिल्लाह कहतें हैं 

तसव्वुर ए क़याम में फिर माशूक़ की तस्वीर बना लेते हैं


हर तस्वीर का वही अक्स उभरा है हर तस्वीर पुरानी है 

 मुसव्विर तू नहीं  तस्वीर जैसी है वैसी ही नज़र आती है 


सहाफ़ी ज़ुबेर

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...