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27/11/2022

सब्र, मुतमईन और शुक्र इलाही

तेरे कजरारे नैनो ने जब मचाया था ग़दर 

हुई तुझसे मोहब्बत तेरी और खींचे इस क़दर

पूरी ना हुई दिल की आरज़ू

जब आये तेरी आँखों में भी आंसू

टूट गए हम क़िस्मत का देख क़ेहर


तुम अश्कबार ना होना, दुआगो हूँ ना आये तेरी आँख में आसूं 

नफरत है हमें जो देखे किसी आँख में आँसू

देखे ना जातें हैं किसी ख़ातून के आँख में आँसू

चाहे हो वोह पराई, तोड़ डालतें हैं

मुझे किसी ख़ातून के आँख के आँसू

 

दोस्त तसव्वुर कर क्या होगा

मेरे दर्द का पैमाना  

जब तू रहे दर्द से बेहाल

जो में देखूं मेरे किसी अज़ीज़ के आँख में आँसू



हमें लगते हैं पुरकशिश ख़ुश-ओ-ख़ुर्रम चेहरे

हमें पसंद हैं हशताते बशताते चेहरे

मायूसी कुफ्र है ऐ मुसलमान 

आज़माइश पर जो करते सब्र, हैं मुतमईन

वहीँ होतें हैं असली चेहरे। 


सहाफ़ी ज़ुबेर 

25/11/2022

एक ग़ज़ल तेरे नाम

तेरे कजरारे नैनों ने हमें तेरा आशिक़ बना दिया

तेरी जुदाई ने हमें मजनू बना दिया

तुम ज़िन्दगी के उस दौर में मिले हमें  

तेरी जुदाई के ख़ौफ़ ने हमें नमाज़ी बना दिया।


उसने मुझे तब छोड़ा जब

उसकी आदत हो गई थी

उसके दीदार को तरस गए हम 

जब उसकी तलब हो गई थी

  

उसको याद कर अश्क़ बहाने की आदत छोड़

तन्हां रहने की अदा सिख ली हमने

तेरे इंतज़ार के उन पलों को याद कर जी लेंगें हम

अब उम्मीद नहीं तेरे वापिस आने की।

मेरी ग़ज़ल को जिन्होंने हव्वा समझ रखा है

मेरे दर्द को देख जिन्होंने तंज़ किया है

में क्या ग़ज़ल सुनाऊँ उनको

जिन्होंने मेरे एहसासात को क़दमों तले रौँद दिया है  

 

मेरे सुबह शाम तेरे नाम लिख दूँ

इस ग़ज़ल की सच्चाई बयान कर दूँ  

मेरी मोहब्बत को सब पर आश्कार कर दूँ 

मेरे कलाम की हक़ीक़त है तू

तेरे नाम पर ज़िन्दगी लिख दूँ। 

 

एक क़फ़स है तेरे बग़ैर मेरी ज़िन्दगी की हक़ीक़त

आये शा म  तू जुदा हुई जब से

तल्ख़ हुए अलफ़ाज़ और साख़ार हुई ज़ुबान


तेरे नाम ने हमें मशहूर कर दिया

गुलाब को इश्क़े नाज़ में हमने गुल कर दिया

ज़माने के अलफ़ाज़ में गुल्लू कर दिया 


।।  सहाफ़ी ज़ुबेर  ।।

17/11/2022

यह बेटियां भी अजीब होती हैं

यह बेटियां भी अजीब होती हैं 

मायके के हर अज़ीज़ का दिल जीत लेती हैं

ससुराल में वहां की हो जाती हैं।  

 

यह बेटियां भी अजीब होती हैं 

डोली उठे तो मायें रोती हैं 

नस्ल बड़े तो सासें खुश होती हैं।  

 

यह बेटियां भी अजीब होती हैं 

जिस भाई से हर दम झगडे 

उस ही को याद कर खूब रोती हैं। 

 

यह बेटियां भी अजीब होती हैं 

ससुराल को अपना लेती हैं 

पर मायके की याद नहीं खोती हैं।  

 

यह बेटियां भी अजीब होती हैं

जिस मायके के बरगद तले पली बढ़ी 

मायके के संस्कारों से जो सीखी 

ससुराल में वहीँ सस्कारों को रोशन करती हैं 


यह बेटियां भी अजीब होती हैं

हर किसी का दिल जीत लेती हैं

मायके में रहें तो उनकी होती हैं

ससुराल पहुंच उनका दिल जीत लेती हैं

  


यह बेटियां भी अजीब होती हैं

हमारी भी एक बिटिया है जिसे 

रुखसत होते देख हमारी आखे 

ख़ूब रोती हैं।  

 

यह बेटियां भी अजीब होती हैं 


सहाफ़ी जुबेर

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...