दोस्तों
लेखक
की
नज़्म
अपने
मुर्शिद
और
उस
शराबे
हकीकी
का
बयान
है
जिसको
पी
कर
एक
शैतान
रेहमान
बन
जाता
है.
कैफियत
वज्द
में
तब्दील
हो
जाती
है.
और
शराबी,
मजनू
या
दीवाना
कह
कर
पुकारा
जाता
है. लेकिन हकीकत
में
इश्क़
में
डूबे
ये
शराबी
हज़ार
हज़ार
गुना
ज़्यादा
अफ़ज़ल
है
उनसे
जो
पीते
है
दुनयावी
शराब
--- *** ---
आशिक आवारा हूँ, तलाशती है हर चेहरे को नज़र,
भटक
रहा हूँ पाने को वो चेहरा दर बदर,
हुआ
मरीज़े इश्क, जब हुई मुझपे तेरी नज़र
जब
ठहरती है तेरे चेहरे पे मेरी भी नज़र.
शराबी
सी कैफियत हुई उतार फेका चौला पुराना
बदला
बे ढंगा अंदाज़ जो हो गया था अब पुराना
पहन
लिया है अब नया लिबास,
पस
अब जिसको देखो
कोई
कहता है शराबी, कोई कहता है दीवाना
उस
शराबी और दीवाने से तो अच्छा है तेरा
दीवाना
और आशिक कहलाना.
तेरी
एक नज़र काम कर गई जो हो ना सका बरसों में
वो
एक नज़र कर गई
बदला
चौला, बदली नज़र, जब बन गया फ़साना
अब
जिसको देखूं वही दिखता है मुझसा शराबी, मजनूँ या दीवाना
मैख़ाना
सजा है साकी के आंगन में,
बेह
रही है शराब मोरे कृष्णा के दालन में
विराजत
है साकी बन मोरे किसन कन्नैया
लबरेज़
हो के झलक गया अब तेरा पैमाना
सभी
परवाने हुए मदहोश शराबे इश्क़ पी कर
दो
बूंद पीला दे साकी ये भी है प्यासा तेरी शराब का.
कभी
भटक गया था अंधेरो में
पर
है तो फूल तेरे ही बाग़ का…
नशा
ऐसा हुआ साकी की शराब का
सात
समुद्र पार भी आता है ख्याल उस बात का
कुछ
पे वज्द हुआ तेरी शराब का और
कुछ
पे कैफियत उस बात का
तेरी
महफ़िल में सभी हैं शामिल
किया
रेहमान किया शैतान,
बुतखाने
में आते है रेहमान भी शैतान भी
तेरे
मैख़ाने का भी है यही हाल
आये
रेहमान भी और शैतान भी
जो
वज्द में आये वो रेहमान और जो कैफियत
दिखाए
वो शैतान
दी
गई है जब तेरे मखाने को एक दुआ
खाली
ना होगा तेरा पैमाना, शराबी ख़त्म हुए तो क्या
पुरानी शराब का हर कोई
है दीवाना