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26/05/2018

आशिक मजनू दीवाना

दोस्तों लेखक की नज़्म अपने मुर्शिद और उस शराबे हकीकी का बयान है जिसको पी कर एक शैतान रेहमान बन जाता है. कैफियत वज्द में तब्दील हो जाती है. और शराबी, मजनू या दीवाना कह कर पुकारा जाता है.  लेकिन हकीकत में इश्क़ में डूबे ये शराबी हज़ार हज़ार गुना ज़्यादा अफ़ज़ल है उनसे जो पीते है दुनयावी शराब
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आशिक आवारा हूँ, तलाशती है हर चेहरे को नज़र,
भटक रहा हूँ पाने को वो चेहरा दर बदर,
हुआ मरीज़े इश्क, जब हुई मुझपे तेरी नज़र
जब ठहरती है तेरे चेहरे पे मेरी भी नज़र.

शराबी सी कैफियत हुई उतार फेका चौला पुराना
बदला बे ढंगा अंदाज़ जो हो गया था अब पुराना
पहन लिया है अब नया लिबास,
पस अब जिसको देखो
कोई कहता है शराबी, कोई कहता है दीवाना
उस शराबी और दीवाने से तो अच्छा है तेरा
दीवाना और आशिक कहलाना.

तेरी एक नज़र काम कर गई जो हो ना सका बरसों में
वो एक नज़र कर गई
बदला चौला, बदली नज़र, जब बन गया फ़साना  
अब जिसको देखूं वही दिखता है मुझसा शराबी, मजनूँ या दीवाना

मैख़ाना सजा है साकी के आंगन में,
बेह रही है शराब मोरे कृष्णा के दालन में
विराजत है साकी बन मोरे किसन कन्नैया
लबरेज़ हो के झलक गया अब तेरा पैमाना
सभी परवाने हुए मदहोश शराबे इश्क़ पी कर
दो बूंद पीला दे साकी ये भी है प्यासा तेरी शराब का.
कभी भटक गया था अंधेरो में
पर है तो फूल तेरे ही बाग़ का…

नशा ऐसा हुआ साकी की शराब का
सात समुद्र पार भी आता है ख्याल उस बात का
कुछ पे वज्द हुआ तेरी शराब का और
कुछ पे कैफियत उस बात का
तेरी महफ़िल में सभी हैं शामिल
किया रेहमान किया शैतान,
बुतखाने में आते है रेहमान भी शैतान भी

तेरे मैख़ाने का भी है यही हाल
आये रेहमान भी और शैतान भी  
जो वज्द में आये वो रेहमान और जो कैफियत
दिखाए वो शैतान

दी गई है जब तेरे मखाने को एक दुआ
खाली ना होगा तेरा पैमाना, शराबी ख़त्म हुए तो क्या
पुरानी शराब का हर कोई है दीवाना

जागे प्रीतम प्यारे,


दोस्तों जब प्रीतम रूठ जाता है और उसकी प्रियतमा उसको मनाती है और प्रियतमा मोहब्बत में तमाम अज़ीयते बर्दाश्त कर के अपने रूठे प्रीतम को मनाने में कामयाब हो जाती है और अपने प्रीतम को पाती है, उस कैफियत और वज्द का वर्णन लेखक ने अपने शब्दों में किया है के किस तरह समूची सीमा को पार कर के उसको प्यार करती है प्यार जताती है.
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जागो प्रीतम प्यारे, कृष्ण दुलारे, मोहन प्यारे
सुन लो तोहरी दुखयारी की फर्याद 
क्यों सो गए, हो गए क्यों खामोश,
ना करो मोहे ऐसे फरामोश,
अब ना रही तोहरे सेहन और आँगन में वो बात
जियरा लागे न तोहरे बिन, सूना सूना लागे
तोहरा सेहन वा आंगन,


महारी इज़्ज़त सैयां जी, अब है तोहरे हाथ,
डाकू लुटेरे पीछे है, कब कर दे पर्दा फाश  


आ जाओ फिर बना दो इस दुखयारी की आस,
कैसे रह पाऊंगी एक भी पल तोहरे बिन,
मान लो अब मोरी बात,
चौतरफा हमला है डाकुओं का लूटेरों का
खतरे में लागे मोरी लाज,
मदद करो मोरी, खुदारा, के बन जाए बद्र वाली बात
तोहरे पास तो रूहानी बेशुमार, मोरे पास सिर्फ है अब आस.
साजन तुम जो मिल जाओ एक पल तो कर लूँ दिल की बात.


बेपनाह अज़ीयत देते है डाकू लूटेरे तोहरी जोगन को,
उसके बच्चो को
दे दो क़ुव्वते रूहानी के जहाँ गिरे पत्थर उनके,
हो जाए डाकू, लूटेरों का बेडा साफ़
कर दो इस ज़मीन को पाक और 
उस ज़मीन को आज़ाद ,
दे दो गेबी पत्थर अब तो मोरे बच्चो के हाथ..

तोहरी जोगन की बस अब ये ही है फर्याद,
खुदारा मदद करो मोरी अब रख भी लो लाज
मोरी लाज जो लूटी सरे बाजार तो,
लूटेगी मोरी फर्याद भी सरे बाजार 

जागे प्रीतम प्यारे, जागे कृष्ण दुलारे, जागे मोहन प्यारे
तुम जो जागे, उजियारा हुआ मोरा संसार,
अब नहीं है कोई खतरा अब नहीं हूँ बेज़ार
तुम जो आये तो फिर से हुई सुहागन तोहरी जोगन
वज्द और कैफियत में हुई पागल
फिर झूम के नाची ऐसा आज के घुंघरू टूट गए.
कुछ बिखर गए कुछ निखर गए.
खुशबू फ़िज़ाओं में फ़ैल गई.
तोहरी जोगन की रख ली तूने लाज

मोरी लाज जो लूट ना सकी सरे बाजार,
तूने कर दी पूरी उसकी फर्याद
अब फिर करूगी कोई दूसरी फर्याद
रखना फिर से मोरी लाज और कर देना पूरी फर्याद

24/05/2018

हुई तुझसे मोहब्बत बदली तकदीर


दोस्तों लेखक की ये नज़्म अपने मुर्शिद की शान में लिखा हुआ एक कसीदा है.  जिसको लेखक ने प्रीतम की उपमा दे कर उनसे फिर रब से प्यारा जताया है.

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मुझे नींद का गलबा तेरी याद से गाफिल करता
मोहब्बत है जिनको सच्ची, फिर उनपे केसा ग़लबा
सोते नहीं है प्रीतम इस जहाँ के
रहने दे भ्रम सो गए प्रीतम, हो गए प्रीतम, उस जहाँ के.


लहू एक है, फिर क्यों है मोहब्बत में भी दो रंग.
दोनों ने ही की थी मोहब्बत, पाने को अपना हमदम,   
फिर दोनों ने लिख दी मोहब्बत में ना मिटने वाली इबारत,
बना ली अपने अपने मेहबूब के लिए एक इमारत,
उसकी इमारत जग देखे तेरी इमारत हम पूजे
उसकी मोहब्बत सब देखे, तेरी मोहब्बत जग पूजे
उसकी मोहबत में है रूसवाई, तेरी मोहबत में है पारसाई

नींद का गलबा न ग़ालिब हुआ तुझको 
कर ना सका गाफिल मोहब्बत करने से तुझको
कर दिया क़ुर्बान सब कुछ पाने को अपने मेहबूब की राज़ी 
फिर ऐसी फ़रज़न्दी आज कहाँ जो हुआ दोनों की रज़ा में राज़ी, 
 
कुछ दुर्रों ने बदल दी अधम की सल्तनत
मोहब्बत हुई तुझसे
दिला दी मखलूक की हुकूमत
दरिया की मखलूक बेताब है देने एक सूई अधम
इसमें तू जाने और अधम के क्या है तेरी हिकमत

तुझको बिना देखे प्यार किया और पाया सब कुछ
उनको देख के प्यार हुआ और खोया सब कुछ
उनकी मोहब्बत में खो कर भी पाया सब कुछ
तेरी मोहब्बत में बस पाया ही पाया है सब कुछ

प्रीतम से मोहब्बत कर, पाई मोहब्बत आपकी
कियों हो खामोश प्रीतम, दिखा दो हो साथ तुम आज भी,  
उस दर से निस्बत मिली, मिले आपभी और तू भी
साथ निभाना प्रीतम हरदम, गर घिर जाऊं तूफानों में
साथ निभाना यहाँ भी और वहाँ भी
अब ऐसों को क्या कहो जो कहते है
सो गए प्रीतम खो गए प्रीतम 

19/05/2018

एक पत्थर इधर भी



दोस्तों लेखक की नज़्म आज के हलाते हाजरा, फलस्तीन और कश्मीर के मुसलमानो के ऊपर जो यहूद और हिन्दू आतंकिओं की बर्बरता, तशद्दुत की जा रही है उसका बयान है. 
 
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जब अपने हो जाए पराये तो हाथों में आते है पत्थर !!
जब बेहने हो जाए बेवा,  तो हाथों में आते है पत्थर !!
मासूम बच्चों की लाशें को देख हाथों में आते है पत्थर !!
जब बेगुनाह चला जाये जेल, तो हाथों में आते है पत्थर !!
दो दिन की बनी है दुल्हन मेहदी निकालने को हाथो में आते है पत्थर.
हमने छोड़ के कलम हाथों में ले लिए है अब पत्थर !!


सऊद ने की है यहूद की मदद जब आया है हाथों में पत्थर
कह दिया तुम हो हाकिम उस ज़मीन के जहा पे था पहला काबा
जब आया है हाथों में पत्थर…


मिल गए जब यहूद और नसारा से तुम ख़त्म करने खिलाफते उस्मानी
देख के दिल दुखा ख़लीफ़ा का खून रेज़ मुसलमानी
हामी हुआ तुम्हारे हर शर पे जो था असल में यहूद और नसरानी
बना के हाकिम बिठाया तुमको जो हुआ अब गुलामे यहूद और नसरानी
एक अलफ़ाज़ न बोल सके तुम उनके हक़ में जिनके हाथो में थे पत्थर
फिर कैसे की वकालत पहले काबा के हो हाकिम तुम बचाने का हक़ है तुमको अपना दामन


मुकाबला है ज़ालिम से तुम करो ज़ुल्म गोली से
जवाब में आएंगे पत्थर..


अब तो हर जगह दिखाई देंगे तुमको पत्थर
अर्श से फर्श तक भर जायेगें पत्थर 


जब तूने दिए एक चोंच में पत्थर तो
हमारे हाथों में लगते है ख़राब क्यों ये पत्थर,
जब एक चिड़िया ने फेक दिए पत्थर बचा लिया
दूसरा काबा
तो काहे को नहीं बरसते आग हमारे हाथों से
ये पत्थर के बच जाए पहला काबा. 


तू तो बैठा बैठा देख रहा है लड़ते है मुजाहेदीन हाथो में ले कर पत्थर
मुकाबिल है तोप, गोली ज़ालिम की, लेकिन हमारे हाथो में दे दे वो चिडिओं वाले पत्थर


ज़ालिम के ऊपर अब कोई रेहम नहीं बना दे आग का दरिया जहाँ गिरे उनके पत्थर
दुश्मन के बच्चे बूढ़े औरतें ये सब जंग में जाइज़ है लेकिन जहाँ जंग ही ना जाइज़ हो वहां
बना दे इन सब को भी पत्थर.


उतार के फेक दिया बुर्क़ा बच्चियों ने और ख़त्म कर दी अपनी नफ़्सानी,
आ गई जंग के मैदान में ले के हाथो में वो भी पत्थर !!
  

सूख गई कलम दानो की सिहाई और बूढ़ी आखो का पानी
और ख़त्म कर डाली एक जवान बहिन ने अपने हाथों की लाली
इतने ज़ुल्म के बाद आखिर कार हाथों में आया था फिर पत्थर
दोनों ही जगह हाथों में जवानो के है पत्थर,
जहाँ चलेगी गोली वहां बरसेगे अब गैबी पत्थर.
दे दे तू कूव्वत रूहानी इतनी के बन जाए आग का शोला ये पत्थर
अब दुश्मन की खैर नहीं जब गिरेंगे तुम पे ये पत्थर.


इतनी क़ुर्बानिओं के बाद जब हाथों में आया है पत्थर
तो कहते हों के फेक दो अब ये पत्थर
दोनों जगह लड़ाई है, ना, पत्थर की ना, ज़मीन की पस इन्साफ कर दो
हाथो से अपने आप गायब हों जायेगे पत्थर 

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...