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30/04/2018

या मुर्शिद अल मदद


मस्जिद से निकलते ही बुतखाने की तरफ भटक रहा था, 
बगदादी राजा आप आये आपने संभाला हे मुझको, 
वो चेहरा जिसने रास्ता दिखाया कोई और नहीं आप ही थे, 
लभों से कलमा ए नातें रसूल जारी था 
कोई और नहीं वो आप ही थे. 
तस्सवुर में समां गया है वो चेहरा कोई और नहीं वो आप ही थे.

मजमा जमा है बुतखानो में महफ़िल सजी है शैतानो में,
काला सफ़ेद में कुछ फर्क नहीं सभी शामिल है, अपने परयो में.
इज़ा पहुँचाना है मकसद उनका मेहमानो को (मुस्लिम तीर्थ यात्री हज और अजमेर)
दो चेहरे नज़र आये इन शैतानो में.  
लगा, हुए अपने परायों से, 
जो दिखे पहले मुझे बेगानो से.
लेकिन वे तो भेजे गए थे आपके आस्तानों से,
कुछ पड़ते थे फिर देखते थे आस्मां को.
हटा मजमा शैतानो का,  नाकाम हुआ प्लान हुकुमरानों का,
पढ़ाई की रेहमानो ने सफाई हुई शैतान की. 

नाकाम हुआ हर मकसद उनका, कामयाब हुआ हक़ इनका.
हुई फतह हक़ पे बातिन की यही सजा है अब शैतानो की.

हुई फतह हक़ की बातिन पे  (सितम्बर १२, २०२० में इज़ाफ़त)

दो चेहरे सदा नज़र आते है एक में अक्स तेरा दुसरे में शैतान नज़र आते है.
तेरा अक्स तेरा चेहरा एहसास हमदर्दी, दस्ते शफकत दुसरे चेहरे डराते है.


दो के नंबर पे हम भी रूक गए 
जबकि दो का नंबर कही से भी मज़हबी होना नहीं है साबित.
फिर भी हर जगह क्यों दो ने ही की है किफ़ालत, 
दीन मज़हब को बचाने की है हिमायत.

दुनिया भी एक कैद खाना है और जेल भी एक कैद खाना है. 
कैद खाने में जो गुज़ारे थे वो दिन एक दिन भी सादिया नज़र आते है. 
उस कैद से तो छूट गया जुबेर इस कैद से छूटना बाकी है.
उस कैद में अज़ीयत नाम भर नहीं थी इस कैद में अज़ीयत काफी है. 

उस कैद में न बहका इस कैद में बहकने का इमकान काफी है.
उस कैद में सहारा तेरा था इस कैद में भी बस तू ही काफी है. 
गिर जाऊं गर गहराईओं में पहुचा देना उचाईओं में.
तेरा दर छोड़ के अब कहाँ जाऊं, तेरे आस्ताने पे आऊं या मस्जिद में जाऊं. 

आप दोनों से निस्बत है मेरी और दोनों के दीदार का मुन्तज़िर हूँ, 
वो जो दो चेहरे देखे थे, वही काले और सफ़ेद यहाँ पर भी है,
लेकिन यहाँ शैतानो का क्या काम आप दोनों तो रहमानी है. 
इश्क हुआ आप दोनों से फिर ये सारी बातें बेमानी है.
एक और मुलाक़ात के लिए तड़प रहा हूँ दीवानगी सर पे हावी है. 
ले लीजिए इम्तेहान केसा भी इश्क़ में ये सारी बाते बेमानी है. 
आपकी एक झलक पाने को लड़ जाऊं दुनिया से 
फिर शैतान किया चीज़ है जब मतीन मेरा हामी है.

लोग कहते है मुझे दीवाना पागल 
उनको क्या पता ये दीवाना अब एक बागी है.  
आपका नाम लेकर शुरू करता हूँ 
और आपके नाम पे ही ख़त्म बस इतनी सी मेरी कामयाबी है.
पूछ लेना कब्र में जो सवाल है पूछना;
शैतान किया बिगाड़ेगा मेरा जब कब्र में 
आपसा हमसाया मेरा साथी है.

ये इश्क़ भी अजीब दीवानगी है, 
जिसे हो जाए उसे कामयाबी है.
लेकिन आशिक और माशूक के बीच ये दीवार कैसी; 
हटा दो सब पर्दे जब हर शै फानी है.
तेरे इश्क में फ़ना होने को हूँ राज़ी. 
अता करो इतनी कूव्वत जहां चाहा आप हाज़िर है.

मेरी दीवानगी के चर्चे अब ज़माने में है 
कोई कहता है ये बागी तो पाकिस्तानी है.
तुम पे जो इतराता हूँ इतना 
तुम जो हाथ खींच लो तो ये बागी 
ना पाकिस्तानी है ना हिन्दुस्तानी.

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