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19/05/2018

एक पत्थर इधर भी



दोस्तों लेखक की नज़्म आज के हलाते हाजरा, फलस्तीन और कश्मीर के मुसलमानो के ऊपर जो यहूद और हिन्दू आतंकिओं की बर्बरता, तशद्दुत की जा रही है उसका बयान है. 
 
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जब अपने हो जाए पराये तो हाथों में आते है पत्थर !!
जब बेहने हो जाए बेवा,  तो हाथों में आते है पत्थर !!
मासूम बच्चों की लाशें को देख हाथों में आते है पत्थर !!
जब बेगुनाह चला जाये जेल, तो हाथों में आते है पत्थर !!
दो दिन की बनी है दुल्हन मेहदी निकालने को हाथो में आते है पत्थर.
हमने छोड़ के कलम हाथों में ले लिए है अब पत्थर !!


सऊद ने की है यहूद की मदद जब आया है हाथों में पत्थर
कह दिया तुम हो हाकिम उस ज़मीन के जहा पे था पहला काबा
जब आया है हाथों में पत्थर…


मिल गए जब यहूद और नसारा से तुम ख़त्म करने खिलाफते उस्मानी
देख के दिल दुखा ख़लीफ़ा का खून रेज़ मुसलमानी
हामी हुआ तुम्हारे हर शर पे जो था असल में यहूद और नसरानी
बना के हाकिम बिठाया तुमको जो हुआ अब गुलामे यहूद और नसरानी
एक अलफ़ाज़ न बोल सके तुम उनके हक़ में जिनके हाथो में थे पत्थर
फिर कैसे की वकालत पहले काबा के हो हाकिम तुम बचाने का हक़ है तुमको अपना दामन


मुकाबला है ज़ालिम से तुम करो ज़ुल्म गोली से
जवाब में आएंगे पत्थर..


अब तो हर जगह दिखाई देंगे तुमको पत्थर
अर्श से फर्श तक भर जायेगें पत्थर 


जब तूने दिए एक चोंच में पत्थर तो
हमारे हाथों में लगते है ख़राब क्यों ये पत्थर,
जब एक चिड़िया ने फेक दिए पत्थर बचा लिया
दूसरा काबा
तो काहे को नहीं बरसते आग हमारे हाथों से
ये पत्थर के बच जाए पहला काबा. 


तू तो बैठा बैठा देख रहा है लड़ते है मुजाहेदीन हाथो में ले कर पत्थर
मुकाबिल है तोप, गोली ज़ालिम की, लेकिन हमारे हाथो में दे दे वो चिडिओं वाले पत्थर


ज़ालिम के ऊपर अब कोई रेहम नहीं बना दे आग का दरिया जहाँ गिरे उनके पत्थर
दुश्मन के बच्चे बूढ़े औरतें ये सब जंग में जाइज़ है लेकिन जहाँ जंग ही ना जाइज़ हो वहां
बना दे इन सब को भी पत्थर.


उतार के फेक दिया बुर्क़ा बच्चियों ने और ख़त्म कर दी अपनी नफ़्सानी,
आ गई जंग के मैदान में ले के हाथो में वो भी पत्थर !!
  

सूख गई कलम दानो की सिहाई और बूढ़ी आखो का पानी
और ख़त्म कर डाली एक जवान बहिन ने अपने हाथों की लाली
इतने ज़ुल्म के बाद आखिर कार हाथों में आया था फिर पत्थर
दोनों ही जगह हाथों में जवानो के है पत्थर,
जहाँ चलेगी गोली वहां बरसेगे अब गैबी पत्थर.
दे दे तू कूव्वत रूहानी इतनी के बन जाए आग का शोला ये पत्थर
अब दुश्मन की खैर नहीं जब गिरेंगे तुम पे ये पत्थर.


इतनी क़ुर्बानिओं के बाद जब हाथों में आया है पत्थर
तो कहते हों के फेक दो अब ये पत्थर
दोनों जगह लड़ाई है, ना, पत्थर की ना, ज़मीन की पस इन्साफ कर दो
हाथो से अपने आप गायब हों जायेगे पत्थर 

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