लो आ गया महीना शहादत ए हुसैन का,
प्यासों को पानी पिलाओ यह
महीना है हुसैन का
लानत भेजो उस मलून पर जिसका
अमल मर्ग-ए-यज़ीद था.
ज़िंदा रहा जिनका नाम वोह
हुसैन था
कर्बला में पानी
रहा बैचैन क्योंकि प्यासा हुसैन था
ख़ानदाने नबूवत कर दिया
नौछावर क्योंकि वोह हुसैन था.
फ़रिश्ते अजिनना थे
बैचेन की करे एक इशारा हुसैन
तबाह कर दें दुश्मनाने
हक़
लबों को सी लिया अपने रब की
रज़ा में हुए राज़ी
क्योंकि आज़माईश में ख़ानदाने
नबूवत और हुसैन था
ख़ुदा की आज़माइश में हुआ
जो कामयाब
वोह हुसैन था,
इस्माइल को नहीं हासिल
हुआ वह मर्तबा -ए-क़ुरबानी
खुदा ने जो वक़्फ़ कर दिया
जज़बाये क़ुर्बानी वोह हुसैन था.
ग़द्दारी की जिन मुनाफ़िक़ों ने
तुम्हारे साथ
पैग़ाम भेज, वादे कर मुकर
गए
क्योंकि तू हुसैन था.
शैतान की नहीं हिम्मत कर
सके हक़ के रस्ते से ग़ाफ़िल
क्योंकि तू हुसैन था.
तेरे अलफ़ाज़ में थी सदाक़त और
दुआ में तासीर।
नहीं की अपने हक़ में दुआ
क्योंकि तू हुसैन था.
वाक़ियाये कर्बला ने कर दिया
चर्चा हुसैन का
हमारे अश्क़ आँखों से बह
निकले सुन कर जज़बा हुसैन का.
पानी ख़ुद हो गया प्यासा
दुश्मनाने हक़ पर
क्योंकि कर्बला में प्यासा
ख़ानदाने हुसैन था.
ग़मे हुसैन और वाक़ियाये
कर्बला पर
बह गया जिसका एक क़तरा भी
आंसू
कामयाब हुआ वोह रोज़ाये महशर
में
क्योंकि वहां भी होगा चर्चा
हुसैन का.
सहाफ़ी जुबेर
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