अँधेरे
कमरों को अपना मुक्क़द्दर बना लिया
रौशनी की चाहत में ख़ुद अपना नफ़्स जला लिया
जिसको
हमने तसव्वूरे ख़यालात में सजाया था
फरिश्ता समझ कर
उसको ही हमने अपना दुश्मन बना लिया,
जन्नत की चाहत में जुबेर,
तेरे दर पे सर को झुका लिया
तूने यह कैसा मोहब्बत पर डाका डाला,
मतलबी
दुनियां का है दस्तूर निराला,
पैसे
मैं हर चीज़ यहाँ है बिकती
बस ख़रीदार चाहिए आला।
सहाफी जुबेर
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