میری بلاگ کی فہرست

24/06/2022

हिज्र की कैफ़ियत

भुलाना था बोहोत मुश्किल तुझे,

भुला ना पाए हम,

जब जब आया बहारों का मौसम

बोहोत याद आये तुम

तेरा हिज्र मेरे वजूद को झंझोर गया

तुझसे तख़्लिया मेरी रूह को ज़ख़्मी कर गया

 

शामे ग़रीबां आ गई, आँखों में अश्क़ दे गयी। 

हिज्र में तेरी सफर गुज़र गया 

तेरे दीदार को जुबेर तरस गया

दिल की बात करें तो किस से जा कर हम,

जिसको अपना समझा वही निकला दुश्मन

जो सूनाया हाल ग़म यार का

समझ बैठा में ही हूँ दिलदार उसके प्यार का।


तेरे हिज्र में हमने बहा दिए अश्क़ इतने,

ख़ुदा की मोहब्बत में गर बहाते उतने

दूर रहते हमसे दो जहाँ के फ़ितने

कुछ ही पल में वोह पास आ गए इतने

उनकी जुदाई के डर से लगे सुबह उठने 


में तेरे अश्क़ों की बनाई हुई तस्वीर हूँ

जो कभी ना मिट सके ऐसी तदबीर हूँ

तेरे साथ जुड़ी हुई तक़दीर हूँ,

कभी ना मिट सकेगा नाम तेरा इस दिल से

में ऐसी तहरीर हूँ।


Zuber

کوئی تبصرے نہیں:

ایک تبصرہ شائع کریں

ہر بچہ کرے گا سوال، کیوں نہ کرے بغاوت؟

 عربوں کو بھیجی گئی چوڑیاں ہوں انہیں مبارک ملت کے ساتھ جنگ میں جو ہوئے نادارِد یہود و نصاریٰ کے آگے سجدہ ریز ہو گئے رہبر افضل ہوتا تم ہو جات...