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16/09/2022

वोह भी चले तुम भी चले।

 अगर ज़िंदा हो तो ज़िन्दगी का सबूत दो

ग़ुलामों, चीख़ बाज़ों की तरह अपनी बेगुनाही का सबूत दो

तुम्हारे ज़हन तुम्हारी शिनाख़्त को किया है असीर

अगर आज़ाद हो तो हक़ लेने का सबूत दो।

 

ज़ालिम तरीन हाकिम है मसनद नवाज़

तख़्त पर फ़ाइज़ है झूटों का ताज

बाबा भी चले असद की राह

तुम दोनों से ही है आज़ादी की आस। 

 

छीन लिया तुमसे जिसने बोलने का हुनर

क्या मुल्ला क्या पंडित हुए बेघर 

बे-यार-ओ-मददगार हुए हम तुम 

ज़ुल्म जब उसका बढ़ गया बेहद

निकल गया अवाम बदलने सरहद। 

 

यह परचम अब तीन रंगों का नहीं

इन रंगों में तेरा लहू शामिल नहीं

दो क़ौमों ने कर दिया अब हमें आज़ाद

 

वोह फ़सादिओं को कपड़ों से पहचानता है

तुम्हारा ख़ुलूस मेरे पैरहन से दिखता हैं

फ़र्सूदा हुए हालात तो क्या,

वक़्त किसी का एक सा नहीं रहता है।  

 

बोहोत तेज़ हुई ज़ुबाने गुफ़्तार,

एक और हुई दुरुस्त उनकी कही बात

क़यामत के हैं सारे आसार

तलवार से तेज़ होगी ज़ुबाने इंसान

फ़क़त मेरी ज़ुबाँ रही ख़ामोश

क़लम को बनाया है हमने हथियार   


वोह भी चले तुम भी चले।  

दोनों चले तो क्या खूब चले।  

 

सहाफ़ी जुबेर

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