जो बात तुझ में है वोह किसी में नहीं
अलफ़ाज़
जो तेरे लबों से झड़ते हैं
वोह
कहीं और देखे नहीं
हक़ गोई जब बन जाए मोमीन की सिफ़त
दो लबों को मिला देता है इस्मे मोहम्मद
फिर बरसती है आस्मां से ख़ुदा की रेहमत
गुलाब के फ़ूलों सी रंगत तुम्हारी
फ़ूल है गुलाब का और रंग गुलाबी
नैज़ों ने की है हिफाज़त तुम्हारी।
तेरे सुबह शाम जब यादे इलाही में गुज़रें अक्सर
चेहरा हुआ है तब नूर से मुनव्वर
गुफ्तगू में आया है तेरे असर
मुर्शिद के मकतब का वोह पहला ज़ीना
बुलंदिओं पर पहुंचा फिर आसमान छूना
किताब लिख दो अलफ़ाज़ ना हो जिसमे बरहना
हर हिकमत, इन्साफ की बात उसमे लिखना।
गुलाबी रंगत से हो गई मोहब्बत हमको
देखा जो गुलाबी पैराहन में हमने तुमको
वोह आ गया रूबरू अर्क़ ऐ गुलाब
और मुश्क़ की ख़ुश्बू ले कर
चल दिए तुम भी उनके साथ हमराह हो कर,
मुर्शिद हमें क़ुव्वत देते गए और हम लेते गए।
सहाफ़ी ज़ुबेर

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