मेरे सनम के हुसन पर क्या कलाम करूँ
नर्गिस-ए-मस्ताना,
तेरे मुजस्समे की क्या हैसियत है महज़ बुतख़ाना
तू मेरी माशूक़ है, में बादशाह हुआ आज
तू मेरे पैरों की जूती नहीं
देखो ना हमें चश्मा ऐ फ़्रांस के साथ
जर्मनी में है मेरा मेहबूब
मन मोह लिया मोरा तोहरी दिलकश
बातों ने
चैन लूट लिया तोहरी अदाओं ने,
तोहरे बुतख़ाने से आला मोरा कोई घर नहीं
मुजस्समा हो जिसमे तोहरा कोई नहीं।मेरा मेहबूब भी बढ़ा ही छुपा
रुस्तम निकला
मुझसे दो क़दम आगे निकला
इश्क़ किया हमसे पर ज़ाहिर ना किया
हमारी हर तहरीर का किया मुलाहेज़ा
पर रहा हम से पौशीदा
हर हिकमत में उसका मिला साथ
कुछ तो किये होंगे हमने भी
अच्छे अमल
घर घर में थी किल किल हर घर थी लड़ाई
वोह बरहना शमशीर क्या हुई
जो आप के ख़िलाफ़ थी उठाई
अज़्म था उतना सख़्त हो जाने को थी हलाक
हुए मोम आप सुन कर सिंफ़-ए-नाज़ुक की बात
कुछ तो है क़ुव्वत इस कलाम में बताओ मुझे भी आज
जिनके क़त्ल का अज़्म ले कर निकले उसी ताहा
के नाम के हुए ग़ुलाम
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