तेरा इश्क़ मर्ज़ है या मरहम
दीदार तेरा दर्द है या दवा
तेरा दस्त बन गया है हर मर्ज़ की शिफ़ा
मज़बूत हुआ तू क़ैद से आज़ाद
बड़ा ही मुश्किल था जब हावी था शैतान
हुई मुवाफ़िक़ सबा जब तेरे साथ हुआ रेहमान
हर दम लानत का मुर्तकिब हुआ तू
तेरी हर बदफैली पर ज़लील और रूसवा हुआ तू
साजिश रच कर बदनाम हुआ तू
४० लंगूर ने ख़ूब मचाया था उधम
रावण सेना के ऊपर फिर भारी पड़े हम
पाक इल्म ने फिर कर दिया तुझे कम
वास्ता मुहम्मद आले मुहम्मद का तुझे दे बैठे हम
माशूक़ के ग़म का वास्ता तुझे दे बैठे हम
मेरा हर ग़म कमतर है जब सामने हो उनका ग़म
जब मक़बूल हुई एक हाजत सरी मुकम्मल होंगीं ताहम
तेरी क़ुव्वत से हो गया नए दौर का आग़ाज़
फ़िक़रे कसने वाले दुश्मनों के मुँह पर होगा क़ुफ़्ल
मसनद नशीन होगा तू ख़ुद्दार जदीद करेगा पाक
फ़ौज भी होगी तुझसे अदना,
अदलिया होगी ख़ुदमुख़्तार पाक साफ़
दुश्मनों के चेहरे लटक कर घुटनों तक आ गए
लंगूर लँगूरनियाँ जो मसरूफ़ थे मखौल में कल तक
बद-हवास देखते रह गए हाय यह क्या हो गया हम कहाँ आ गए।
सहाफ़ी ज़ुबेर
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں