लुटती रही भारत की बेटियों की अस्मत
घूम रहे हर गली नुक्कड़ पर ज़ानी दरिंदे बे ख़ौफ़
आज
बेटियों पर ऐसा भी वक़्त आया
तालीम
दिला कर भी उन्होंने क्या पाया
वाल्दैन
ने उनको ख़ूब पढ़ाया
अब
तो मेहफ़ूज़ नहीं तालीम याफ़्ता
उत्तराखंड की नर्स
हो या हो जर्राह
अपनी
बेटियों को तुम ख़ुद ही सम्भालों
हाकिम
नाइंसाफ और बे औलाद आया
बेटियों
को लाख पढ़ा दो उनको दुर्गा का रूप भी दे दो
पर
उस ग़लीज़ नियत का क्या करोगे जहाँ साधु के भेस में रावण आया
घर से निकलना हुआ बेटियों का दुश्वार
कहीं शोहदे पानी उड़ाएं कहीं कॉलेज में इज़्ज़त दी जाए उतार
कैसे वाल्दैन अपनी बेटी को पढ़ाएं और किस के लिए बढ़ाएं
हर नज़र ऐसे घूरती जैसे वोह हों उनकी समस्यांए
सहाफ़ी ज़ुबेर
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