जंग हुई हक़ और बातिल के
दरमियान
बातिल था ११ से हदफ़ पर, ख़त्म करें
मुसलमान
वजूद मिटा दे इस्लाम
अहल-ए-सफ़ा हुए मरदूत ए हरम
अहल ए हक़ के साथ हुए हम
मुनाफ़िक़ बन कर सीसा पिलाई दिवार
करेगें बातिल, ज़ालिम को मेहफ़ूज़ हम
अहल ए हक़ ने किया बुनयान उल मरसूस का आग़ाज़
भूल गया इब्लीस क़ौल क़ुरान
जब करता हक़ वालों पर तनकीद, लगा कर फ़रेबी इल्ज़ाम
ख़ुदा जिसे चाहे इज़्ज़त दे जिसे करे ज़लील
ख़ुदा जिसे गुमराह करने आ जाए उसे संभाले कौन
जिसे ख़ुदा सँवारने पर आ जाए उसे बिगाड़े
कौन
बातिल ताक़त के हाथों हुआ तू असीर
ज़मीर फ़रोश की मानिंद अहल हक़ को
ख़तम करने की देता तजवीज़
कलमा ए तोहीद रौंदा गया बंद की ज़ुबाँन
बेरुन मुल्क जा कर बना दुश्मन ए इस्लाम
ताक़त तुम्हारे अल्फ़ाज़ मै नहीं होती ए नस्ल
इंसान
ख़ुदा भी देता है उनका साथ जो होते हैं कामिल ईमान
मुल्ला था मिर्ज़ा देता था दर्स मरा हो कर
मुर्तद
ख़रीदा था ज़मीर उसका नसारा ने
करने कमज़ोर तेहरीक ए हुर्रियत
वसीम मै भी था बोहोत आलूद ख़िलाफ़ अहल हक़
हुआ बाग़ी उम्मा का नबी का और बदल डाला क़ुरान
रब ने बदली उसकी तक़दीर ना इधर का रहा ना
उधर का रहा बदलने पर क़ुरान
तेरी भी सिफ़त वही है भरा पड़ा है ज़हर हक़
वालों के नाम पर
आगे क्या करता है तेरा फ़ेसला रब बातिल, ज़ालिम का
साथ देने पर
यज़ीद का हमराह हुआ बेईमान
जो कहता था ख़ुद को अहल ए ईमान
बदगुमानी ऐसी हुई हावी तुझ पर अहल हक़ को
क़त्ल करने तकलीफ़ देने का देता है पैग़ाम
सहाफ़ी ज़ुबेर
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