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09/11/2022

तेरी आँखों के सिवा

तेरी आँखों के भँवर में ऐसे फसे हम

तुझको जब भी तस्वीर में देखा

ख़ुद को ख़तावार ही समझे हम  

तुझको देखे बिना क़रार ना था

तेरी आँखों का हम पर ख़ुमार सा था

तेरी मोहब्बत का हल्का सा सुरूर था

जब तुम जुदा हुए तब आँखों में नमी

और तेरा चेहरा सामने था

सफ़ेद लहू वाले भी ख़ुद को मुसलमान कहतें हैं

जिनके दिलों में नहीं मोहब्बत ख़ुद को एहले ईमान कहतें हैं

आतिशे इश्क़ का जूनून तो दिखा पहले

हम ख़ामोशी को ज़ेहनी ग़ुलाम कहतें हैं

हम तो आपकी खुली हुई ज़ुल्फ़ों को घटा कहतें हैं 

आपकी आखों को नशे में डूबी रात कहतें हैं 

आपके रुखसार पर तो कुछ कलाम किया ही नहीं हमने 

चेहरे के नीचे लबों को सुर्ख गुलाब हम कहतें हैं।  

 

तेरी आखों के सिवा कुछ भी नहीं हमें पसंद 

तेरी ज़ुल्फ़ों की छावों के तलबगार थे हम 

ख़ता किसी की भी हो तेरे गुनाहगार नहीं हम।   

 

सहाफ़ी ज़ुबेर 

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