तेरी आँखों के भँवर में ऐसे फसे हम
तुझको जब भी तस्वीर में देखा
ख़ुद को ख़तावार ही समझे हम
तुझको देखे बिना क़रार ना था
तेरी आँखों का हम पर ख़ुमार सा था
तेरी मोहब्बत का हल्का सा सुरूर था
जब तुम जुदा हुए तब आँखों में नमी
और तेरा चेहरा सामने था
सफ़ेद लहू वाले भी ख़ुद को मुसलमान कहतें हैं
जिनके दिलों में नहीं मोहब्बत ख़ुद को एहले ईमान कहतें हैं
आतिशे इश्क़ का जूनून तो दिखा पहले
हम ख़ामोशी को ज़ेहनी ग़ुलाम कहतें हैं
हम तो आपकी खुली हुई ज़ुल्फ़ों को घटा कहतें हैं
आपकी आखों को नशे में डूबी रात कहतें हैं
आपके रुखसार पर तो कुछ कलाम किया ही नहीं हमने
चेहरे के नीचे लबों को सुर्ख गुलाब हम कहतें हैं।
तेरी आखों के सिवा कुछ भी नहीं हमें पसंद
तेरी ज़ुल्फ़ों की छावों के तलबगार थे हम
ख़ता किसी की भी हो तेरे गुनाहगार नहीं हम।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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