फ़क़त एक टोपी की अज़मत ने मुझे नमाज़ी बना दिया
सवाली था जो कभी पहले
मुझे आक़ा बना दिया
सिर्फ़ तेरे नाम में
ही बरकत नहीं है मतीन
तेरे पैराहन ने मुझे
आशिक़ बना दिया।
महकने लगा सारा आलम
बू ए यार से
हमारा दौलतखाना बन गया
ज़खीरा इत्र की दूकान से
यह तुम्हारा ही तो करम
है मुर्शिद
पहचाने लगा आलम हमें
ख़त के अलफ़ाज़ से
इश्क़ में जूनून की हद
को पार कर
मंज़िल पाई बिल-आख़िर
तेरे दरबार से
तेरे इश्क़ की महक से
मेरा किरदार मोहत्तर हो गया
दीदार ए यार से दिल पाक
और
अलफ़ाज़ से मज़मून मक़बूल
हो गया
मेने इस दिल को तेरे
इश्क़ के नेज़े से पेवस्त कर दिया
शहवत के एहसास को इश्क़
की आतिश में ख़ाक कर दिया
सफ़र ए मजाज़ी का आग़ाज़
था शहवत
उसको हक़ीक़ी पर ख़त्म
कर दिया
बड़ा ही आवारा है एहसास
ए इश्क़ मेरा
हर ख़ूबसूरत पर जाग उठता
है
मुवाज़ना कर देखा जब भी
हर चेहरे को
मेरे सनम के आगे हर
चेहरा कमतर नज़र आता है
सहाफ़ी ज़ुबेर
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