मुद्दत हुई उनसे हमें मिले
हुए
मोहब्बत कर रक़्स-ए-बिस्मिल हम हुए
हमने तो ग़ैरों को भी अपना लिया
गर दुशमन भी जो दर पे हमारे आया माफ़ किया
तूने हमसे किनारा कर किस जुर्म का बदला लिया।
दर्दमंदाना मोहब्बत ना हुई तेरी, एक आह एक गिर्या साबित हुई
हर आह पर तेरा नाम हर गिर्या पर तेरा अक्स नज़र आया।
नीम ज़िबह परिंदे सी कैफ़ियत हो गई है
ना ज़िंदा हूँ ना हूँ मरों में जमा
तेरी फ़ुर्क़त में अज़ीयत से तड़पने की आदत सी हो गई है
नहीं था होश तेरे इश्क़ में इतना पड़ेगा तड़पना
गर होता इल्म के इश्क़ का इम्तेहान है देना
तय्यारी करते हम क़ब्ल अश्कों में डूब पड़ता जीना
ख़बर ना थी इस क़दर संगदिल ज़ालिम मोहब्बत होगी तेरी
फ़ुर्क़तज़दा हूँ हर चेहरे में तलाशता हूँ सूरत तेरी
आज हुजूम-ए-आम साथ देने तैयार है
पस एक तूने स्टेटस ना दिखा अज़मत ना रखी मेरी
तुझसे भी शिकवा है मेरा मौला (राह दिखाने वाला)
जब फ़ुर्क़त ही थी तक़दीर हमारी
कियों आये थे वोह ज़िन्दगी में हमारी
पहले तो नाज़ो अदा के जलवे दिखा बना दिया दीवाना
रुख़ को फ़ेर लिया जब आया मौक़ा साथ निभाना
इस मोहब्बत ने हमें भी कर दिया बर्बाद
किसी काम के ना रहे जो कभी थे आबाद
तूने भी दिल तोड़ दिया ग़ैरों की तरह
जा तू भी सलामत रहे औरों की तरह
सहाफ़ी ज़ुबेर
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