क्या फ़लसफ़ी बाज़ मसलक की करता है बात
तेरे फ़लसफ़ों ने खड़ी कर दी उम्मा के दरमियान नफ़रत की दिवार
तेरे फ़िरक़ावाराना बुतख़ाने से मैख़ाना भला लगता है
ना कोई मसलक ना मज़हब की दिवार
हर ख़ास ओ आम के लिए खुला है माशूक़ का दरबार
हर परवाना मस्त है पी कर इश्क़ की शराब
पहन लिया तेरे नाम का नया पैराहन
पुराना रंग हुआ बेरंग माशूक़ के इश्क़ का हुआ एक रंग
चलते रहो मुजाहिदों तेग़ की ललकार के साथ
उठ खड़े होंगे नौजवान जब आएगी मिल्लत पर बात
आज़ाद परिदों को नहीं आता ग़ुलामी के क़फ़स में जीने का हुनर
मसलक के झगड़े तर्क कर हो चुकी है क़ौम एक जी एक जान
अब मिल्लत पर ना होगा दूसरा फ़िरों मुसल्लत
ख़ुरासान से होंगे बुलंद जब सियाह अलम
ख़ौफ़ ज़दा होंगे उम्मत के दुशमन
मसख़रे जो दिखाते हैं नाटक में मसनूई करतब
हक़ीक़ी मुजाहिदों को देख होंगे घर बंद
अकेले ने ही तबाह कर दी पाक बस्ती
हक़ीक़ी मुजाहिद जब होंगे रू बरू
ऐसे मसख़रे के हाथ से अब उठेगी न तख़्ती
क़ुव्वत इंसान के ना दौलत में है ना शोहरत में
ईमान की दर्जे हरारत, हुस्न-ए-सुलूक
अवाम पर इंसाफ़ की बाला-दस्ती में है
जो अक्सरियत करते हैं पाक पर लतीफ़े
अगर हक़ीक़ी मर्द है तो हटा दे
अपने चारों जानिब हिफ़ाज़ती दस्ते
हाकिम वोह जिससे ज़ालिम, नाइंसाफ़ डरे
ख़ौफ़ ए ख़ुदा से अपनी रियाया से ख़ुद हाकिम डरे
फिरता है कोई आलम में उड़ाता है मौज टैक्स दीदा के माल पर
कही हाकिम ख़ुद लाया अनाज काँधे पर लाद कर
एक बूढ़ी इसरार पर
कहीं हाकिम मिसमार कर रहा घरोंदे गुरूर मसनद पर
कहीं उमर अश्कबार हो गए ख़ौफ़ ए ख़ुदा से
ज़ईफ़ा की फ़र्याद सुन कर
एक एक ज़ुल्म का हिसाब देना होगा ज़ालिम ए मसनद
तबाह और बर्बाद हो चूका तमाम शुमाल ज़ेर-ए-आब हो कर
कहीं बुतख़ाने में दबे हज़ारों, कहीं बह गई कारें हज़ारों
सहाफ़ी ज़ुबेर
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