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17/08/2023

पानी की ताक़त

 क्या फ़लसफ़ी बाज़ मसलक की करता है बात

तेरे फ़लसफ़ों ने खड़ी कर दी उम्मा के दरमियान नफ़रत की दिवार

तेरे फ़िरक़ावाराना बुतख़ाने से मैख़ाना भला लगता है

ना कोई मसलक ना मज़हब की दिवार 

हर ख़ास आम के लिए खुला है माशूक़ का दरबार 


हर परवाना मस्त है पी कर इश्क़ की शराब

पहन लिया तेरे नाम का नया पैराहन  

पुराना रंग हुआ बेरंग माशूक़ के इश्क़ का हुआ एक रंग   


चलते रहो मुजाहिदों तेग़ की ललकार के साथ  

उठ खड़े होंगे नौजवान जब आएगी मिल्लत पर बात 

आज़ाद परिदों को नहीं आता ग़ुलामी के क़फ़स में जीने का हुनर  

मसलक के झगड़े तर्क कर हो चुकी है क़ौम एक जी एक जान 

अब मिल्लत पर ना होगा दूसरा फ़िरों मुसल्लत


ख़ुरासान से होंगे बुलंद जब सियाह अलम 

ख़ौफ़ ज़दा होंगे उम्मत के दुशमन 

मसख़रे जो दिखाते हैं नाटक में मसनूई करतब

हक़ीक़ी मुजाहिदों को देख होंगे घर बंद 


अकेले ने ही तबाह कर दी पाक बस्ती 

हक़ीक़ी मुजाहिद जब होंगे रू बरू

ऐसे मसख़रे के हाथ से अब उठेगी न तख़्ती 


क़ुव्वत इंसान के ना दौलत में है ना शोहरत में 

ईमान की दर्जे हरारत, हुस्न-ए-सुलूक 

अवाम पर इंसाफ़ की बाला-दस्ती में है 


जो अक्सरियत करते हैं पाक पर लतीफ़े

अगर हक़ीक़ी मर्द है तो हटा दे 

अपने चारों जानिब हिफ़ाज़ती दस्ते


हाकिम वोह जिससे ज़ालिम, नाइंसाफ़ डरे 

ख़ौफ़ ए ख़ुदा से अपनी रियाया से ख़ुद हाकिम डरे


फिरता है कोई आलम में उड़ाता है मौज टैक्स दीदा के माल पर  

कही हाकिम ख़ुद लाया अनाज काँधे पर लाद कर  

एक बूढ़ी इसरार पर 


कहीं हाकिम मिसमार कर रहा घरोंदे गुरूर मसनद पर 

कहीं उमर अश्कबार हो गए ख़ौफ़ ए ख़ुदा से  

ज़ईफ़ा की फ़र्याद सुन कर 


एक एक ज़ुल्म का हिसाब देना होगा ज़ालिम ए मसनद 

 तबाह और बर्बाद हो चूका तमाम शुमाल ज़ेर-ए-आब हो कर  

कहीं बुतख़ाने में दबे हज़ारों, कहीं बह गई कारें हज़ारों 


सहाफ़ी ज़ुबेर 

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