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26/02/2025

बादशाहों की आमद का आग़ाज़

 बादशाहों की तारीख़ फिर दोहराई गई

तारीख़ में काबुल से आये समरक़ंद से आये

और आये बुख़ारा

 

आज कल दौर चला है क़तर से आये दुबाई से भी आये

बिल आख़िर आयेगें सऊदी से नबी अरबी हमारे

मायूस ना हो तुम कुफ़्र की ज़मीन पर झंडे गड़ेगें तुम्हारे 


अल्लाह के दोस्तों की क्या है बात 

किसी के सच्चे हुए बंद आँखों के देखे ख़्वाब

किसी के खुली आँखों के पूरे हुए ख़्वाब 

किसी ने जो देखा जो सोचा वोह पूरा हुआ हसरत का मिज़ाज 


ज़ालिमों, कुफ्र पर हमारे हाकिमों का आज भी खौफ़ दिखता है

यही तो इस्लाम का ग़लबा है, हर वक़्त किसी का ख़याल रहे दुश्मन के ज़हन मै

वोह शख़्स मरा नहीं आज भी तेरे दिल मै ज़िंदा है


हमने तो ना किया कभी तारीख के सफों को बदलने का दावा

हमने कभी मंदिरों आश्रमों मै घुस कर नहीं लगाया नारा

ज़मीन मै दफ़न कर दिया भगवान हमारा

हर जगह यही है झूठा दावा तुम्हारा


यह तो है अपनी अपनी सक़ाफ़त का नतीजा

तुम्हारे वालिद ने डाका डाला काम ना किया दूजा

हमारे वालिद ने इमारतें बनाई एक हिंद बर्रे सग़ीर बनाया

 

अब नस्लों का भी है वही हाल हमारे अब्बू की इमारतों

पर डाका डालें नाम बदलें शहर जगहों के नाम हमारे

 

गर तुम्हारे अब्बू ने किया होता कोई काम अच्छा

तो डाकू का वारिस ना डाकू केहलाता


हमारी हाकिमियत में हिन्द सोने की चिड़िया कहलाया 

तुम्हारे बादशाह ने फ़क़ीर बनाया 

यह देख तू आज भी पछताया, उसकी ही जलन में तूने उधम मचाया

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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