बादशाहों की तारीख़ फिर दोहराई गई
तारीख़ में काबुल से आये समरक़ंद से आये
और आये बुख़ारा
आज कल दौर चला है क़तर से आये दुबाई से भी आये
बिल आख़िर आयेगें सऊदी से नबी अरबी हमारे
मायूस ना हो तुम कुफ़्र की ज़मीन पर झंडे गड़ेगें तुम्हारे
अल्लाह के दोस्तों की क्या है बात
किसी के सच्चे हुए बंद आँखों के देखे ख़्वाब
किसी के खुली आँखों के पूरे हुए ख़्वाब
किसी ने जो देखा जो सोचा वोह पूरा हुआ हसरत का मिज़ाज
ज़ालिमों, कुफ्र पर हमारे हाकिमों का आज भी खौफ़ दिखता है
यही तो इस्लाम का ग़लबा है, हर वक़्त किसी का ख़याल रहे दुश्मन के ज़हन मै
वोह शख़्स मरा नहीं आज भी तेरे दिल मै ज़िंदा है
हमने तो ना किया कभी तारीख के सफों को बदलने का दावा
हमने कभी मंदिरों आश्रमों मै घुस कर नहीं लगाया नारा
ज़मीन मै दफ़न कर दिया भगवान हमारा
हर जगह यही है झूठा दावा तुम्हारा
यह तो है अपनी अपनी सक़ाफ़त का नतीजा
तुम्हारे वालिद ने डाका डाला काम ना किया दूजा
हमारे वालिद ने इमारतें बनाई एक हिंद बर्रे सग़ीर बनाया
अब नस्लों का भी है वही हाल हमारे अब्बू की इमारतों
पर डाका डालें नाम बदलें शहर जगहों के नाम हमारे
गर तुम्हारे अब्बू ने किया होता कोई काम अच्छा
तो डाकू का वारिस ना डाकू केहलाता
हमारी हाकिमियत में हिन्द सोने की चिड़िया कहलाया
तुम्हारे बादशाह ने फ़क़ीर बनाया
यह देख तू आज भी पछताया, उसकी ही जलन में तूने उधम मचाया
सहाफ़ी ज़ुबेर
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