वोह क्या बात है जिसने रात की तारीकी में मुझे जगाया
ना बिहिशत की आरज़ू ना
जहन्नुम का ख़ौफ़
तेरे इश्क़ ने रातों
की तारीकी में मुझे जगाया
रात की तारीकी और चश्म ए नम
किसी ने ना देखा बस तूने देखा
होगा पसंद फ़रिश्तों को तेरा मुस्कुराना
हमें तो हर मसले पर तेरा किफ़ालत करना पसंद आया
चलते चलते तू ही मिल गया था
ग़म ए हिज्र का फासला तवील हुआ
मुलाक़ात का वक़्फ़ा मुख़्तसर था
इब्लीस ने चाहा तुम्हें बर्बाद करना
अल्लहा को था तुम्हें आबाद रखना
इम्तेहान का नतीजा नहीं है अहम
अल्लाह को था तुझे तेरी नस्लों को खुश खुर्रम
शादबाद करना
नतीजे के आने से क़ब्ल क्यों ख़ौफ़ज़दा हो हम
मशक़्क़त जब कोई नहीं की कम
नतीजे को करें अल्लाह के हवाले हम
अपनी तालीम को बना ले तू जूनून अपना
फ़िर मुश्त में है तेरा हर सपना
झुकेगी दुनियाँ तेरे आगे, तू सजदा रेज़ होजा ख़ुदा के आगे
तेरा वक़्त लेने को होगा जहाँ बेक़रार
तू ख़ुदा के हवाले कर वक़्त अपना
तू कर अपने मसले उस मालिक ए बरहक़ के हवाले
फ़िर देख तू रहे सबसे आगे, आलम तेरे पीछे भागे
सहाफ़ी ज़ुबेर
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