जब भी देखा तुझे अपने आस पास ही देखा
वही
जूनून वही हक़ परस्ती पाक मुहाफ़िज़ में देखा
चिमनी
है एक दरीचा जिससे झलक के नूर आया
अमनी
हुई तेरे इश्क़ मै दीवानी तूने उसका ख़ूब साथ पाया
इश्क़
करने वालों को माशूक़ से ख़ौफ़ केसा
जब
भी देखा तुझे रहमान और रहीम सा देखा
निकल
गया उस अज़ीयत से जो तेरी जानिब से आई
क्या
में हुआ कामयाब उस आज़माइश में
मेरी
हालत बताई
हर
तकलीफ़ तेरी ही अता कर्दा
हर
तकलीफ़ को तुझ तक लौट के जाना
सहाफ़ी
ज़ुबेर
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