सहाफी जुबेर का कथा वाचक चंद्रलेखा जी को इज़हारे मोहब्बत।
नाज़रीन आज कल जो भारतीय जनखा पार्टी के हिजड़े हर मोहब्बत करने वाले को परेशान करतें हैं और तरह तरह के हीले बाज़ी से उसको अपनी गिरफ्त में लेना चाहतें हैं। तो इस सहाफी ने अपनी कविता के माध्यम से देवी चंद्रलेखा जी को इज़हारे मोहब्बत भेजा है। नाज़रीन सहाफी को इन हिजड़ों को दिखाना ही मक़सद है की सच्चा प्यार करने वाले जिगर रखतें हैं और एक संघी तो क्या समूची न्यायपालिका, संसद, विधान मंडल मंत्री संत्री आतंकवादी आ जाएँ अगर एक बार उन्होंने सच्चे दिल से किसी का हाथ थाम लिया तो दुनिया उसके सामने कमतर होती है। यह अज़्म है। फिर जो अपनी पत्नी को मेहफ़ूज़ नहीं रख पाते और उसकी इज़्ज़त आबरू की हिफाज़त नहीं कर पाते उनके लिए चूनौती होगी। अगर चंद्रलेखा जी जिनकी इज़्ज़त करता है सहाफी और तहे दिल से सलाम करता है उनके जज़बात की जो उन्होंने अपनी कथा के दौरान व्यक्त किये थे की अगर अज़ान हो तो हम भी आँखे मीच कर अल्लाह का नाम लें। बस वही है सच्ची उपासना और इस सहाफी के आदर का पात्र बनी।
तेरे अलफ़ाज़ की तारीफ करूँ
या तेरे एहसास की,
तेरे चाँद से मुखड़े की तारीफ करूँ
चन्द्रलेखा या तेरे हाफ़ज़े की
कहती हो कथा ब्रज के लाल की
करती हो बातें रसख़ान की भी
बचा क्या जब रोक दी कथा सुन के आवाज़ अज़ान की
अब कर लो बात ढाई अक्षर वाली मेरे सनम की
तुम ना बनो प्रेम में ब्रज की गोपी
आ जाओ मेरे देस में, मेरे पास मेरे अपनों में
चाहे कह दें तुम्हारे अपने कथा जिहाद
या कर दें क़ैद कह कर लव जिहाद
और बदनाम करें हमें ज़माने में।
चलो मेरे पीछे थाम के मेरा दामन (लम्बी पट्टी नुमा कपडे का साफा)
मेने थामा है मेरे सनम का हाथ चलो लगा लो चक्कर उसके आंगन
हम दोनों करेगें मोहब्बत (लव) कहने दो जिहाद उनको
चल आ जा तू भी मैदान में तोड़ के दिखा हमारे हाथ पैर
इश्क़ करेगें हमतो खुल्लम खुल्ला तू अगर सेर है तो हम दो सेर
अपनी मर्ज़ी ना थोपें हमपे, हम इश्क़ कर बैठें हैं उनसे
उनकी जानिब से आ जाने दो जवाब
फिर हम तुमसे क्या ज़माने का कर देंगे हिसाब
तुम्हे हक़ है पाने का अपना प्रेम
और चलो उस राह जो है सच्ची चलें जिसपर मीम
बोहोत से नक्श उभरेंगे तुम्हारे आगे
और बोहोत सी निकलेगी तलवार
डटें रहना हक़ के पथ पर
चाहे करे कोई कितने भी झूठे वार
मोहब्बत मांगती है क़ुर्बानी
और देना होता है इम्तेहान
अगर लगन है सच्ची और ज़िद्द की पक्की
तो हम होंगे कामयाब
सहाफी जुबेर
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