बस्ती बस्ती, नगर नगर
हर चौराहे, हर डगर
तलाशें तुझे मेरी नज़र
बैचैन, हैं मेरे नैना और व्याकुल है जिगर,
तुझको देखे बिना ना है सबर
है काश मेरी तलाश को मिल जाए क़रार
तू आ जाए सामने से कर ले दिल की बात
ना जाने क्या हुई हमसे ख़ता
जो हुए तुम हमसे जुदा
वोह भी क्या ज़माना था
तुझसे मिलने का बस एक बहाना था
हर राह तो अब काली नज़र आती है
तुझसे मिलने की हर उम्मीद
अब तो टूटती जाती है
अपनी बेरुख़ी पर हूँ पशेमान
मुक़ामी इंतज़ार में ना आया
इस बात का कभी ध्यान
कर बैठा इतनी बड़ी गुस्ताख़ी
जब जुदा हुई तू, तो किस बात की माफ़ी।
अब तो मेरे इश्क़ का बस यही है फ़साना
तुम्ही ने दर्द दिया है तुम्ही दवा देना
या रब दुआ है यही तुझसे
मिला देना फिर उनसे
कौन ज़िंदा है तेरी ज़ुल्फ़ के सफ़ैद होने तक
हम इंतज़ार करेंगें सेहर होने तक
ख़ाक़ ना होंगें हम तुझको खबर होने तक
ख़ुदा करे की क़यामत हो और तू आये.
सहाफी जुबेर
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