नाज़ी ने बढ़ाई नफ़रत खड़ी की मज़हब की दिवार
सूफ़ी आया मोहब्बत का पाठ पढ़ाया
तेरी इंसानियत उसी वक़्त फ़ौत हो गई जब तूने
मज़लूम के दुखों का मखौल बनाया
अहवाल ए दर्द हमदर्द बन के पूछा
बग़ल में मुँह कर के दर्द को हंसी में उड़ाया
महज़ महान लिख देने से कोई ख़ित्ता ज़मीन नहीं होती महान
ज़मीन का रक़बा नहीं अवाम का किरदार, हुस्न ए सुलूक और मोहब्बत
बनाता है ज़मीन को अज़ीम
जहाँ अवाम के दिलों में मोहब्बत की जगह भरा हो मज़हबी मवाद
वोह ख़ित्ता और ज़मीन नहीं हो सकती कभी महान
तुम्हारी मुनाफ़ेक़त तुम पर ही होगी भारी
कहाँ एक माफ़ी बाज़ फ़िरक़ापरस्त बन गया वीरों का वीर
कहाँ हाकिम ए वक़्त हो गया ज़ालिम, क़ातिल हो कर भी आमलगीर
होगा तेरा नाम शरीफ़ों के शरीफ़
दर हक़ीक़त तेरे किरदार में पोशीदा हैं हद दर्जे के ख़बीस
तेरे फ़ज़ल में भी दिखता है शैतान
कलाम कैसे कर सकता है कोई तुझसे रेहमान
नफ़रत की ज़मीन पर हम मोहब्बत की दास्तान लिखेगें
ज़हरीले क़लम से निकले आलूद को मोहब्बत से ख़तम करेगें
तुम बांटोगें अवाम को मज़हब की दीवारों में
हम मोहब्बत की डोरी से बाँध कर रहेगें
तुम फ़ैलाते रहो नफ़रत हम दिलों को फ़तह करते रहेगें
तुम निकालते रहे शमशीर के क़िस्से हम सूफ़ी का बयान करते रहेगें
तेरी मोहब्बत में भी दग़ा और नफ़रत
हमारी नफ़रत में भी मोहब्बत
तुम करते हो सिर्फ़ दिखावे की मोहब्बत
हम करते हैं हक़ीक़ी मोहब्बत
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