हक़ और ईमान वाले हो गए फ़तहयाब
हर ख़ित्ते में होंगे
अहल ए ईमान ही सरफ़राज़
जो कर रहे थे मिल्लत
की माश पर डाकाज़नी
एक झटके से उनके
सर धड़ से अलग हो गए
क्या अफ़ग़ान क्या पश्तू क्या ख़ुरासान, अगला हदफ़ है हिंदुस्तान
सब फतह होते गए जब सियाह अलम ले चला है तालिबान
किसी की क़ुव्वत नहीं की रोक ले हक़ के सिपाही
बा आवाज़ बुलंद अज़ान हुई जब शमशीर उमर ने उठाई
अहल ए कुफ़्र हो तुम्हारा काम है लतीफ़े बनाना
बोहोत चला तुम्हारा बिलडोज़र पर अब हमें ना डराना
रूस और अमेरिका के कलिसानों में जिसने तबाही मचा दी
तुम्हारी क्या हैसियत है तुम ठहरे गोरों के ग़ुलाम सिपाही
अब गटर फेम के आलूद की है बारी
एक अकेले ने तबाह की थी नाटक में मसनूई पाक बस्ती
आ रहें हैं मुजाहिद ज़रा दिखा दे अपनी हक़ीक़ी हस्ती
सब होंगे हलाक ना रहेगा कुफ्र ना उसकी बस्ती
घर में हुआ पोशीदा गटर फेम अब ना उठेगी तख़्ती
अब्दाली, ग़ज़नवी से हो चुके हो तुम रू बरू
सोमनाथ को तबाह कर फिर मस्जिद बनेगी हू बहू
मुग़लों को कहा आक्रांता तुम्हारे आबा-ओ-अजदाद को लूटेरा
थे ज़ालिम अफ़ग़ानी ग़ज़नवी और अब्दाली
उनके वारिस आ रहें हैं तालिबानी
मत गिड़गिड़ाना मियाँ घुमक्कड़ तुम हिंदुस्तानी
सहाफ़ी ज़ुबेर
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