ब्रद्रान ए मिल्लते इस्लामियां अस्सलामो अलयकुम,
आज कल जो ज़ाफ़रानी वाइरस और ज़हर की वजह से हालात मुल्क में मुसलमानों की निस्बत से हो रहें हैं उसमे आपको अपने वोट का इस्तेमाल बोहोत ही ज़हानत के साथ करना है। इस मरहले में बोहोत सी तंज़ीमे नाम निहाद सेक्युलर जमातों को ख़ास सपा, बसपा, कांग्रेस को कोसते हुए आपके दरमियान आयेगीं। अब मुसलमान दरी नहीं बिछायेगा कुर्सी नहीं उठाएगा बल्कि क़लम की ताक़त से इन को जवाब देगा। हम हमारी हिस्सेदारी माँगेगें। और बोहोत सी ऐसी बाते करेगें जिससे ज़ाहिर हो की वोह मुसलमानों का हमदर्द है। दर हक़ीक़त ऐसी ही तंज़ीमें और नुमाइंदे नामनिहाद सेकुलरों की जानिब से सिर्फ और सिर्फ ताक़वर तंज़ीम मजलिस के मुस्लिम वोट काटने के लिए खड़े किये जातें हैं। मुस्लिम एक मुश्त हो कर सिर्फ और सिर्फ मजलिस के नुमाइंदों को वोट करें। जो तंज़ीमें और नुमाइंदे बड़ी बड़ी बातें कर रहें हैं अकलेश कांग्रेस को कौस रहें हैं अगर इनको इतनी ही मुस्लिम हमदर्दी है तो मजलिस जैसी तंज़ीमों के साथ इत्तेहाद करें अपना खुद का एक महाज़ बनाये ताके मुस्लिम वोट नहीं बटे और एक मुश्त पड़े। अगर जंग लड़नी है ताक़त दिखानी है तो इत्तेहाद करो फर्दन फर्दन जंग लड़ रहे हो अपने ही भाई के खिलाफ खड़े हो रहे हो मतलब तुम मिल्लत के ख़ैरख़्वाह नहीं बल्कि दुश्मन हो। अगर नामनिहाद, ज़ाफ़रानी तंज़ीमों ने तुम्हारे साथ धोका किया है तुम्हारी हक़तल्फ़ी की है; तुम्हारी और मजलिस की एक ज़ुबान है अपने हक़ को लेने की जद्दो जेहद है तो मजलिस से इत्तेहाद करो।
सहाफ़ी ज़ुबेर
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जो कभी कपड़ों से पहचाने थे हमको
ज़लील हो कर लौट रहें हैं मालदीव के दर से
लुगाई देख कर जो हुआ था कभी फ़रार
हमारा किरदार ए क़तल कर कपड़ों से पहचाने का था
कभी जिसका इसरार
उसके कारिंदों को सादे कपड़ों में नहीं रहने का इख़्तियार
जब हक़ीक़त हुई सब पर आशकार
तब भी शर्मिन्दा नहीं हुआ अपनी झूट पर मक्कार
मेरे रब की लाठी है बेआवाज़
जब पढ़ती है पानी भी नहीं मांग पाता
दहशत, झूठों का सिपाह-सालार
जिन्होंने कभी लगाई थी हिन्द में अंगार
उन्हें हक़ नहीं रह सकें सादे कपड़ों में भी हिन्द से बाहर
भाइयों और बहनों यह जो हकाले जा रहें हैं
उनके ज़हरीले, फ़िरक़ापरस्त ज़हन से
वोह दहशतगर्द कहलाये जा रहें हैं
अबू के मुजस्समे पर अभी बना रहें हैं लंगूर और संघी जश्न
ज़ईफ़ हाकिम है कब तक रहेगा उसका टसन
नई नस्ल को बनने दो ज़रा हाकिम
मालदीव जाओगे भूल ऐसा होगा कुफ्र का हश्र
सहाफ़ी ज़ुबेर
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