शीशे के टूटने की आवाज़ सब ही ने सुनी
उस नुक़सान की तकलीफ़ सब ही को हुई
दिल मेरा शीशे सा नाज़ुक़ अनमोल क़ीमत
फ़िर भी ज़ालिम ने दिल मेरा इतनी ख़ामोशी से तोड़ा
किसी को कानो कान ख़बर ना हुई
जहाँ मामूली शीशे के टूटने की तकलीफ़ सभी को पहुँची
मेरे अनमोल दिल के टूटने की ईज़ा सिर्फ़ मुझको ही हुई
दुश्मन का अक्स भी एक था, जब तक शीशा सालिम रहा
शीशे के टूटते ही हर ज़ाविये से दुश्मन नज़र आ गया
टूटा शीशा दुश्मन पर दो धारी शमशीर साबित हुआ
माशूक़ की मोहब्बत ने मुझे तन्हा कर दिया
फ़ितना अंगेज़ लोगों से दूर कर रब से रिश्ता जुड़ गया
कितने दर्द पोशीदा हैं क़ल्ब ए मोमीन मे
कहाँ की बात करूँ इराक़, लिबिया, अफ़ग़ान
हिंद, कश्मीर या जय फ़लस्तींन
जितना ज़ुल्म ज़ालिम का बढ़ता गया देख उम्मत का सब्र
इस्लाम फ़ैलता गया बुलंद परवाज़ मोमीन करता गया
मिल्लत को बदलना होगी सरमायकारी
समझना होगी अपनी ज़िम्मेदारी
किसी ग़ुलाम सोच की बोहोत सुन ली
नहीं करेगें हम सियासतदारी
मौजूदा दौर मे ग़ुलाम शायर भी करता है वही बात
सुनते आये सबसे बस वही थोतली बकवास
हमारे मसले कितने हल किये
अब तो होगी हिस्सेदारी की बात
सहाफ़ी ज़ुबेर
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں