दीन ए बरहक़ आएगा, इस्लाम का परचम लहराएगा
हाकिम लाख दबाना चाहे हक़ की आवाज़ों को
बिल आख़िर कुफ़्र भी कहेगा ला इलाहा इल्ललाहा
जब जब ज़ालिम का ज़ुल्म हद से बढ़ जाएगा
ज़ालिम हर मज़लूम के अंदर मुजाहिद पायेगा
जब नाम निहाद सेक्युलर क़ानून साज़ों ने बंद कर ली ज़ुबान
मुस्लिम हक़तल्फ़ी की जंग क़लम पकड़ने वाला ही लड़ जाएगा
फ़िर तेरे ज़ुल्म का पर्दा फ़ाश हो गया
फ़िर ख़ाकी नाइन्साफ़ हाकिम के साथ हो गया
लूटती रही मेरी मस्जिदें फ़िर देहशत के हाथ मे तलवार और
भगवा परचम आ ही गया।
तालीम साज़ों ने जो अब तक थाम रखी थी क़लम
इतने ज़ुल्म की तेज़ हवा ने
उनके हाथ मे शमशीर थमा ही दिया
ज़ालिम का ज़हर उसके ही मुल्क का दुश्मन बन गया,
ग़द्दार है तू तेरी सिफ़त मे है ग़द्दारी
जो राम का ना हुआ अपनी तंज़ीम का ना हुआ
वोह अपने मुल्क का वफ़ादार कब से हो गया।
हमारे पास अब खोने को कुछ भी नहीं
तुम्हारे पास अभी भी बड़ा हिस्सा है जो पहले ही तक़सीम हो गया
हमको जो भी मिलेगा हमारे लिये असासे तुम से जो भी छिना तुम्हारे लिये ख़सारे
सहाफ़ी ज़ुबेर
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