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05/07/2024

ग़ुलाम सोच से बेहतर है

ज़ालिम के साथ चलने, हुकूमत की चापलूसी करने से

बेहतर है मैने ख़ामोशी इख़्तेयार कर ली

इंसानियत का क़त्ल ए आम होते देख राजा के तलवे चाटने 

से बेहतर है हमने आँख बंद कर ली

 

ज़ालिम की शान बयान करने से, 

ना इंसाफ़, हक़तलफ़ हुकूमत की हिमायत करने से 

बेहतर है मे हक़ लिख कर ज़िंदान मे चला जाऊँ सूली पर चढ़ जाऊँ


ग़ुलाम सोच से बेहतर है मेरी आज़ाद बाग़ी फ़ितरत, 

गर सूली पर चढ़ गया मेरे ख़ून के हर क़तरे से आयेगी 

आवाज़ अनल हक़, अनल हक़ अनल हक़


आज़ाद फ़िज़ाओं मे जब गूँजेगी हमारी नस्लों की किलकारी, 

माएँ फ़ख़्र से कहेंगी ग़ुलाम नहीं आज़ाद सिफ़त थी हमारी।


हमारी ख़ामोशी को हुकूमत न समझे अपनी फ़तह , 

ना हम पर तारी हुआ ज़िंदान की तारीकी ना सूली का ख़ौफ़

इश्क़ ने हमको भी निकम्मा बना दिया नहीं तो अभी भी बाक़ी है वही जोश।


माशूक़ को पसंद नहीं हमारा जारिहाना अंदाज़, 

उनको पसंद है हमारा बाग़ी कहलाने से अच्छा हमारा आशिक़ कहलाना


हमारी ख़ामोशी मे पोशीदा है हिकमत 

मीर जाफर, मीर सादिक़ की नस्लों को मिटाना

अफ़सर हो या पेहलवांन सब पहॅुचेगे अपने अंजाम

 

जब तालीम वाले क़लम को छोड़ करते हैं असलहे पर भरोसा

जंग वोह  फ़िर होती है और भी पेचीदा


मिल्लत की है आरज़ू की बना लूँ ख़ुद को और पेचीदा  

माशूक का है इसरार रहो एक दम सीधा सादा मिज़ाज

 

सहाफ़ी ज़ुबेर

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