रोशन जमाल ऐ यार से अंजुमन तमाम
देहका हुआ है आतिशे गोशे चमन तमाम
मौलाना हसरत मोहानी रेहमतुल्लाह अलैहे
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ख़ौफ़ दुश्मने हक़ से कैसा
उसके बाज़ूओं में वोह क़ुव्वत नहीं
ईज़ा पंहुचा सके तुमको
मगर जितनी ताक़त दी है अल्लाह ने उसको
क्या कभी परवान चढ़ेगी
आज़ाद फ़िज़ाओं में हमारी नस्लें
इस ग़ुलामी से है
अफ़ज़ल तुम तोड़ दो अपनी क़समें
वतन की मोहब्बत का
जो उठा रखा है कांधे पर तुमने
एक रोज़ तुम्हे भी आना होगा बहार तोड़ कर ग़ुलामी की ज़ंजीरें
अज़्म अपना पुख़्ता, कर मंज़िल मुक़र्रर
तज़लज़ुल रहा ज़हन में तो हदफ़ ना होगा मुकर्रर
आज़ाद हुए वोह, क्या तुम हो अभी भी आज़ाद
ज़ुबान पर तुम्हारे क़ैद नस्लों को देना वफ़ादारी का जवाब
इस्म मुस्लिम से ख़फ़ा हैं हमातन
फ़र्ज़ हो गई सबूत वफ़ादारी तुम पर एहले वतन
उम्र गुज़र गई समा'अत करते वही नारा हर दम
इब्लीस मौजूद है मस्जिदों में जमात की सफ़ों में
तुम्हारे क़त्ल की साजिशें हो रहीं हैं एवानों में
कुफ्र के एवानों में जब बजेगी ख़तरे की घंटी
तक़दीर तुम्हारी तब सरबुलंद होगी
तेरे पौशीदा एहसास से बैदार हो जाता हूँ
ख़्वाब-ए-ग़फ़लत से जाग जाता हूँ
सहाफ़ी ज़ुबेर
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