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09/02/2023

दरूद पढ़ो।

जहालत की सहाफ़त को हो गया है फ़हम

उन से ज़्यादा कोई नहीं अक़लमंद  

दिल की असल कैफियत जिनकी रही पौशीदा

जुबां से निकले हर अलफ़ाज़ ज़हरीला  

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क़ासिर हूँ समझने ऐसी सहाफ़त की लुग़त  

हक़ की बंदगी छोड़ सुख़न बयाँ करने लगे 

हाकिम की नाज़ेबा हरकत 

गर नमाज़ी ना हो मस्जिदें करो आबाद फ़र्ज़न्द

निकाह मस्जिद में, करो ज़िंदा सुन्नत फ़र्ज़न्द

वालिद ऐ दुख्तर पर बोझ ना डालो ज़्यादा फ़र्ज़न्द

तक़्सीम-ए-वर्सा दो बेटी का, हुक़ूक़-उल-'इबाद अदा करो फ़ौरन


बदहवास सी होगी कैफ़ियत

हर नफ़्स होगा परेशान

कोई ग़म-गुसार ना होगा सिवा ऐ तेरे आमाल 


जब मीज़ान में तुम्हारे आमाल रखे जायेगें

तुम्हारे गुनाह सज़ा की मोहर लगायेगें

जलाल रब्बे काबा का देख

हर नबी की कैफ़ियत ख़ौफ़ज़दा पायेगें

 

हर नबी या रब्बी नफ़्सी या रब्बी नफ़्सी  दोहरायेगें

एक नूर नमूदार होगा गुनाहगारों के चेहरे चमक जायेगें

आप उम्मत के गुनाहगारों पर फ़िक्र मंद और परेशान नज़र आयेगें 

 

अजल के वक़्त जो कलमा था लबों पर 

आप वही दोहरायेगें रब्बी हब्ली उम्मती रब्बी हब्ली उम्मती


दरूद की तासीर से मीज़ान झुका दिए जायेगें 

फ़क़त एक अदना सा पुर्ज़ा कमाल कर जाएगा 

हमको बख़्शवाने का सबब बन जाएगा 

लाखो गुनाहों के बोझ से उठा हुआ मीज़ान 

दरूद की क़ुव्वत से अदब से झुका दिए जायेगें 


चंद ही सज़ा के हक़दार होंगे 

सज़ा मुकम्मल कर बख़्श  दिए जायेगें  

    

सहाफ़ी ज़ुबेर

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