नूर से मुनव्वर हुआ चेहरा तेरा
इल्म की रौशनी से नया इतिहास लिखा
तू लाख छुपा ले अपनी हक़ीक़त
ज़ालिम की शमशीर में वोह क़ुव्वत ना रही
इश्क़ ऐ यार में जो ताक़त देखी
हर्फ़ बा हर्फ़ नीर बहा आँखों से
तेरे अल्फ़ाज़ों की किताब जो हाथों में देखी
तेरी हर बदकारी ज़ुल्म की हद भी देखी
तेरी ख़ामोश ज़ुबान ने मेरे इल्म की क़ुव्वत देखी
आँखों से एक क़तरा बह निकला जो पानी
जाने किधर चला जाता है
झलक दिखा कर किधर ग़ायब हो जाता है
जिन्न है या तेरा अक्स,
छु कर देखा तो अहसास ना होता है
इब्लीस मौजूद है जमात
की सफ़ों में
मिल्लत के रहबरों होशियार
रहो
तजस्सुस मेरा तुझसे
और बढ़ जाता है
जब भी में तुझको हिजाब में
माशूक़ को बेहिजाब देखता हूँ
इश्क़ मेरा तुझसे और
बढ़ जाता
कस्ब-ए-हलाल की फ़िक्र
करो
लाइल्मी की तारीकी में तजस्सुस रहेगा बरक़रार
बनो इल्म का दाना अपने हक़ का
तक़ाज़ा करो बार बार
सहाफ़ी ज़ुबेर
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