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06/04/2023

शर्म हया के हिजाबी पर्दे

 नूर से मुनव्वर हुआ चेहरा तेरा

इल्म की रौशनी से नया इतिहास लिखा हुआ

तू लाख छुपा ले अपनी हक़ीक़त 

होगा वही जो तहरीर ऐ क़ुरान हुआ


ज़ालिम की शमशीर में वोह क़ुव्वत ना रही

इश्क़ ऐ यार में जो ताक़त देखी

 

हर्फ़ बा हर्फ़ नीर बहा आँखों से

तेरे अल्फ़ाज़ों की किताब जो हाथों में देखी  

तेरी हर बदकारी ज़ुल्म की हद भी देखी

इन आँखों से तेरी तबाही और बर्बादी भी देखी


तेरी ख़ामोश ज़ुबान ने मेरे इल्म की क़ुव्वत देखी

आँखों से एक क़तरा बह निकला जो पानी

तेरी हस्ती को मिटाने वाली कायनात देखी


जाने किधर चला जाता है

झलक दिखा कर किधर ग़ायब हो जाता है

जिन्न है या तेरा अक्स,

छु कर देखा तो अहसास ना होता है

हवा के झोंके की तरह महसूस होता है


इब्लीस मौजूद है जमात की सफ़ों में

मिल्लत के रहबरों होशियार रहो

ज़ाहिरी शैतान 
के बजाये पोशीदा दुश्मन से


तजस्सुस मेरा तुझसे और बढ़ जाता है

जब भी में तुझको हिजाब में 

माशूक़ को बेहिजाब देखता हूँ

इश्क़ मेरा तुझसे और बढ़ जाता

जब चेहरे पर शर्म हया और नूर देखता हूँ


कस्ब-ए-हलाल की फ़िक्र करो

गर मर्द हो तो बनो तुम ख़ुद दाना


लाइल्मी की तारीकी में तजस्सुस रहेगा बरक़रार

बनो इल्म का दाना अपने हक़ का  

तक़ाज़ा करो बार बार


सहाफ़ी ज़ुबेर 

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