फ़िराक़ ए यार में हाल यह हो गया
उदास है दिल मेरा तेरी जुदाई में पर
कैफ़ियत पर उसका कोई एहसास ना रहा
ज़ुल्म जब ज़ालिम का हद से बड़ जाये
हर मज़लूम के हाथ में फिर असलाह आ जाये
अदलिया जब फ़िरक़ापरस्त हो जाये,
तब मज़लूम फ़ैसला ख़ुद कर जाये
कश्मीर हो या मणिपुर फिर ज़ालिम ना इंसाफ़
हाकिम हर मज़लूम में एक सी सिफ़त पाये
शुमाल में ज़ाफ़रानी उधम ढाये, जल्द है की
ज़ालिम अपने किये ज़ुल्म पर
पछताए
अनक़रीब है की कोई गिरोय ऐसा उठ जाये
जो ज़ालिम को तबाह कर जाये
शाहकाल इक़तेदार के नशे में शान से
ज़ुल्म पर ज़ुल्म करता गया,
कब अदना से ३ ने जज़ीरा तबाह कर दिया
उसे पता भी नहीं पड़ पाये
सहाफ़ी ज़ुबेर
کوئی تبصرے نہیں:
ایک تبصرہ شائع کریں