है हुकुम हर ख़ास ओ आम बना ले
अपनी तन्हाई ज़िक्र ए इलाही से बेहतर
क़ैस के ऊपर कोई क़ैद नहीं, कहीं भी रहे
लैला की याद दिल में बसा कर
हम भी तनहा हो गए माशूक़ की याद दिल में बसा कर
तन्हाई में भी पाते है तवानाई उनका नाम ले कर
हर दम रहता है भरम उसके दीदार का
कहीं से वोह आ जाएँ पूछ लें हाल दिल ए बेक़रार का
जब ज़ुल्म ज़ालिम का हद से बढ़ गया
हर वोह बच्चा भी जंग में निकल गया
जिसको कभी आती नहीं थी अय्यारी
जंग की इस आतिश ने दुश्मन का हर क़िला तबाह कर दिया
हमारे ऊपर वही वहशत वही तन्हाई रही बाक़ी
पाक क़ुव्वत देख परेशान है नापाक क्यों कर
जंग में जब होंगे रू बरू असलाह डाल देगा ज़ालिम
माशूक़ के रुख़सार का नूर देख कर
९३ का ख़ूब बनाया लतीफ़ा एहल ए कुफ्र ने ७१ में
तुम्हारे ऊपर अब हुकूमत पाक होगी तुम्हारी ग़फ़लत में
फ़िर सजेंगी मेहफ़िलें दयार ए यार में
हर अवाम शामिल रहा जश्न शब ए आज़ादी में
सहाफ़ी ज़ुबेर
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