काश हम आपसे मिले ही ना होते
हिज्र के दिन हमारे मुक्क़द्दर ना होते
झलक दिखा कर तुम कभी ग़ायब ना होते
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
किताबों में हम आपका चेहरा तक रहे ना होते
महफिलों में आपको तलाश रहे ना होते
हुजूम में खुद को अकेला ना पा रहे होते
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
मेरे जज़बात मेरा जिगर आपके हवाले ना होते
आपका दर्द आपके ख़्वाब हमारे ना होते
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
कोई तो बाहाना तलाश कर, फिर एक मुलाक़ात का
कोई तो ततबीर कर फिर से दीदार का,
मेरी कशमकश मेरी उलझन का जवाब है तू
फिर कोई बहाना तलाश कर हर बार ज़ीना (सीढ़ियां) चढ़ने का।
बदहवास सी कैफियत है,
तेरे ख़यालों में गुम रहता हूँ
बात कही ईरान की तूरान की सुनता हूँ
हम ऐसे तो पहले कभी ना थे
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
तेरे वादों का तेरी क़समों का पासो लिहाज़ कर
ख़ुद को किया है बर्बाद हमने
आज हम भी पहले जैसे होते
काश हम आपसे मिले ही ना होते।
सहाफी जुबेर
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