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06/03/2021

कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है।

नाज़रीन स्वरा भास्कर जी को कभी कभी बाग़ी इंक़लाबी ख़याल आतें हैं, यह कविता उनको और मेरी एक अज़ीज़ दोस्त को भी सरशार है. 


कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं,

तू मेरी होजाहम तेरे हो जातें हैं।

मेरे दिल को वोह भातें हैं

जो मेरे हम ख़याल नज़र आतें हैं. 

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 



चल हम दोनों मिल कर आवाज़ लगाते हैं 

फिर देखें कितने हमारे पीछे आतें हैं,

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 

 

जब हुकूमतें हों तानाशाह 

फिर हम तुम क्या सभी हम वतन 

बाग़ी नज़र आतें हैं.

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 

 

तपिश हो गईं शांत भास्कर की आतिश में 

चल फिर से आग लगाते हैं  

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 

 

कभी जो मेरा दिल बैठ जाता है 

मेरे दिल में तो कुछ अलग ही ख़्याल आतें हैं 

इस दिल में तो बोहोत सी बातें हैं,

अच्छा लगता है जब वोह एक हमदर्द 

दोस्त बन कर बातों में लगाते हैं



कभी इधर की कभी उधर की बनाते 

बातें हैं,

उनको भी सुकून नहीं जब तक 

हम पुराने जुबेर नहीं बन जातें हैं 

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 



अब हम वतनों में कहाँ रहीं ऐसी बातें हैं 

अब तो जो भी करे हक़ की बात 

वोह सभी ग़द्दार बाग़ी इंक़लाबी 

हुकूमत को नज़र आतें हैं. 

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं. 

 

हुकूमत की यही बातें 

आपस में भाई को भाई से लड़वातें हैं 

हिन्दू मुस्लिम का बेर बढ़ा कर 

वोह अपना सियासी नफ़ा पातें हैं 


चल मिल कर सभी इन्साफ, हक़ 

के परचम को बुलंद करवातें हैं 

कहने दो उन्हें बाग़ी, ग़द्दार 

हाँ हम सभी इंक़लाबी कहलाते हैं.  


चलो आज हम यह क़सम उठाते हैं,

दूर करो उन्हें सियासत के अखाड़े से 

जो मज़हब के नाम पर लड़वाते हैं 

कभी कभी तेरे दिल में

बाग़ी इंक़लाबी ख़्याल आते हैं.  


सहाफी जुबेर  

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