ले कर आये थे हम रब से चंद साँसें
कुछ तेरे इंतज़ार में बीत गई
कुछ तुझे समझने में बीत गई।
कम अक़ल था ज़ुबेर उम्र बीता दी फ़ासले बढ़ाने में
जब अक़ल आई उम्र बीत गई
माशूक़ को याद कर जो सफ़ेद काग़ज़ करता हूँ काले
निखर आई है सुख़नवरी तेरे ख़यालात में डूब जाने के बाद
मुक़द्दर की गिरह को खोल रहा है गिरह खुलती ही नहीं
गिरह खोलने लगाने से तक़दीर बदलती नहीं
ख़ुश्क पत्तों की सरसराहट भी जो कभी हम उनकी भांप लेते थे
आज क़ुर्ब है इतना उनकी नज़दीकी का भी होश नहीं
ख़ामोश बुतों के सामने अश्क बहा रहा है ज़ालिम
आज़माइश और इम्तेहान दिये बग़ैर मार्फ़त मिलती नहीं
ख़ुदा की तलाश में भटक रहा है तू दर बदर
दर हक़ीक़त अपने दिल को छोड़ कही ख़ुदा मिलता नहीं
मस्जिदों, बुतख़ानों में ख़ुदा को तलाश रहा मुल्ला पंडित
शिकस्ता, ज़ईफ़, लाचार, मज़लूम के दिलों में ख़ुदा बस्ता है
इसके सिवाए कहीं मिलता नहीं
आलम ए असबाब की हिर्स और ख़त्म हुआ लुक़मे का ज़ायक़ा
बस माशूक़ के ज़िक्र में मिलता है बेहिसाब लुत्फ़ और ज़ायक़ा
ले आओ तुम अपने हज़ारों ख़ुदाओं को
एक ख़ुदा ज़ालिम पर काफ़ी है
जो ज़ालिम की शान में पड़ें क़सीदे
अब उन मुनाफ़िक़ों को बर्बाद होने की बारी है।
ज़ालिम के लिए एक झटका मुनाफ़िक़ों पर बस दो काफ़ी हैं
सहाफ़ी ज़ुबेर
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