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26/07/2023

ज़ाहिर तक़वा होता है

ज़ाहिर तक़वा होता है, जब ख़्वाहिशों पर क़ैद होता है

कहीं लज़्ज़त ए जाम होता है कहीं हक़ीक़ी पास होता है

 

ग़ुस्ल ए आब से जिस्म पाक होता है

तक़वे और परेहज़गारी से पीर-ए-मुग़ाँ दूर होता है

पानी के ग़ुस्ल से नजासत दूर होती है

तक़वे के ग़ुस्ल से रूह पाक होती है 

 

बात चली गुलशन में सुकून पाने वालों में 

सिफ़त बताई किसी ने महदूद कर लो हर पैमाने में

एतेराज़ तेरा बेमानी है ए ख़ातून

महदूद कर लो ख़ुद को मुर्शिद (माशूक़) के काँसें में 

जब मिलो अहले दुनिया से ख़ंदा-पेशानी में


अहले आदम से मिलो ऐसे उनको ख़ुदा नज़र आ जाए 

दरवेशों से मिलो तो तुम्हारा किरदार नज़र आ जाए 


माशूक़ को तलाशो तन्हाई में, इबादत करो अकेले में 

दुनियां वालों से मिलो हुजूम में

ना तुम्हारा महदूद पसंदी का ज़ौक़ होगा ख़तम 

ना दुनियां वालों से मिलने का शौक़ होगा कम  


जब भी दुनियां के रंज-ओ-अलम से गुज़रता हूँ 

तुझको या रब ख़ुद के बोहोत ही क़रीब पाता हूँ 


माशूक़ की याद अब नासूर बन गई मुर्शिद 

ना इश्क़ ए मजाज़ी याद रहा ना इश्क़ ए हक़ीक़ी याद रहा 

बेख़ुदी का वोह आलम हो गया 

माशूक़ के सिवाए कुछ भी याद ना रहा


करो नमाज़ क़ायम AZAN का वक़्त होता है 


सहाफ़ी ज़ुबेर 

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