दर्जा दर्जा
तेरे हुस्न का हुआ चर्चे
दर्जा दर्जा
मेरे इश्क़ का हुआ चर्चे
परवाज़ अपनी
बुलंद करता चल दर्जे बा दर्जे,
रब मिलेगा आख़िर
दर्जे
हद दर्जे की
कमालात हैं माशूक़ की सिफ़त
हर फ़न में इल्म
है बेहिसाब और ज़हानत
पस एक मर्ज़ ए इश्क़ कर के तुमसे मुर्शिद,
हर मर्ज़ से पाक होने की मिल गई ज़मानत
जलाल तो सिर्फ़
नाम ही है तुम्हारा
जमाल ही जमाल
बिखरा पड़ा है सारा
कियूँ कर हम उस
महफ़िल की रौनक़ बने
जिसमे मेरी
मोहब्बत की दास्तान ना हो
कियूँ हम उस
महफ़िल को रौशन करें
जिसमे तेरा
ज़िक्र ना हो।
कियूँ हम उस महफ़िल की ज़ीनत बनें
जिसमे मौजूद माशूक़ ना हो
सहाफ़ी ज़ुबेर
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